कोविड 19 का प्रभाव और भारतीय शादियों का बदलता स्वरूप।

आलेख- विकास चन्द्र अग्रवाल,

कहावत है – जोड़ियाँ स्वर्ग में बनती है धरती पर तो हम रस्मों का अमली जामा मात्र  पहनाते हैं ।

शादी के नाम से ही एक अलग सा  माहौल जहन में आने लगता है। एक हँसी खुशी, गीत संगीत से भरा खुशनुमा भीड़ भरा माहौल। शादी तय हो जाने के बाद सबसे बड़ा काम होता है शादी में बुलाए जाने वाले मेहमानों की सूची तैयार करना।इसके अलावा शादी की खरीददारी, किसी मैरिज लॉन अथवा होटल को तय करना,केटरर, फूलवाला,बिजली वाला और भी बहुत सारा काम और भगदड़।

शादियों के सीजन में शाम के समय सड़कों पर कुछ और ही नजारा होता है। जगमगाते हुए मैरिज लॉन और होटल और उनके बाहर सडक़ों पर खड़ी गाड़ियों का हुजूम,बैंड बाजे की धुन पर नाचते बारातियों की रौनक ।जहाँ यह सब यातायात को कुछ समय के लिए पटरियों से उतार देता है वहीं शादी शुदा लोगों के मन में एक बार पुरानी यादें फिर  ताज़ा  करा जाता है और कुवारों के मन में अपने भविष्य में आने वाले दिन की कल्पना से एक मीठी सी गुदगुदी।

अगर बात करें तो आजकल के समय में शादी में भाग लेना बाहर घूमने फिरने जैसा हो गया है। दोस्तों और रिश्तेदारों से मिलना जुलना, उनके साथ फोटो खिंचवाना,और तरह तरह के पकवानों का आनन्द लेना बहुत ही दिलकश होता है।

80% से ज्यादा मेहमान तो बारात के आने से पहले की वापस लौट जाते हैं और बारात समय से आ गयी तो खाना खाने के बाद। बहुत कम मेहमान होते हैं जिनको जयमाल या अन्य वैवाहिक संस्कारों को देखने में दिलचस्पी होती है । घर पहुँच कर हम आपस में क्या बातचीत करते हैं – खाना कैसा था,सजावट कैसी थी,आपके जानने वालों में कौन कौन आया था । शायद ही कभी दूल्हा और दुल्हन के विषय में कोई चर्चा होती है ।

कोविड 19 आने के बाद यह सब कुछ बदल गया है । सोशल मीडिया पर इन दिनों एक मैसेज बहुत पसन्द किया जा रहा है- “तुम क्या मुझसे मुकाबला करोगे , तुम्हारी शादी में  जितने मेहमान हैं , उससे ज्यादा तो मेरी शादी में बैरे थे।”

भले की यह एक मजाक हो लेकिन कॅरोना के प्रकोप के बाद यही सच्चाई है । वर्तमान नियमों के अनुसार दोनों पक्ष मिलाकर मात्र 50 लोग एक बारात में शामिल हो सकते हैं। कुछ हालात सुधरने पर हो सकता है यह सँख्या बढ़ कर सौ हो जाये । अब मेहमानों की सूची बनाते वक़्त दूसरी समस्या है ,  किसको बुलाएँ किसको छोड़ें । वर्तमान हालात में बाहर से कौन आएगा यह प्रश्न भी बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है ।

50 लोगों की बारात के लिए व्यवस्था करने के लिए आपको कितनी बड़ी जगह की आवश्यकता होगी ? न तो बैंड बाजा बारात जरूरी रह जायेगा और न  ही सड़कों पर यातायात ही बारातों की वजह से अवरुद्ध होगा । सामाजिक दूरी बनाए रखने और फेस मास्क लगाये रखने के कारण ग्रुप फोटोग्राफी और डीजे की रौनक अब फीकी फीकी सी रहेगी।

बचपन से सुनते आ रहे हैं कि आने वाले समय में शादियों के आयोजनों पर होने वाले खर्चों पर रोक लगेगी । पर हुआ इसके ठीक विपरीत। मोहल्ले में सड़क घेरकर होने वाली शादियाँ धीरे धीरे मैरिज हॉल व होटलों में शिफ्ट हो गईं । शादियाँ कराने के लिए इवेंट मैनेजमेंट  कंपनियों मैदान में आ गईं और अगर आप पैसे वाले हैं तो डेस्टिनेशन वैडिंग से भला आप कैसे इनकार कर पायेंगे । जिनके पास पैसा है उनके लिए तो यह सब ठीक है परन्तु परेशानी उनके लिए है जिन्हें अपने जीवन की  सारी संचित पूंजी और कभी कभी उधार लेकर भी इस अन्धी  दौड़ में शामिल होना पड़ता है।

इन्सान खुद तो शादियों में होने वाली फिजूलखर्ची और दिखावे को नियन्त्रित करने में नाकामयाब रहा परन्तु प्रकृति ने कॅरोना  के प्रकोप के रूप में इसको प्रतिबंधित करने का प्रयास किया है।

हमें प्रकृति के इस सन्देश को आत्मसात करना होगा। हमें वैवाहिक संस्कारों की शुचिता को पुनः स्थापित करना होगा और फ़िज़ूलख़र्ची व दिखावे को दरकिनार करना होगा । हमको समझना होगा कि वैवाहिक जीवन की पूर्णता परस्पर विश्वास और प्यार में है न कि इस दिखावे में।

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