बेनी बाबू के बाद कौन कुर्मी समाज का नेतृत्वकर्ता राकेश, विवेक, सुरेंद्र या कोई और?

उत्तर प्रदेश में हिंदू समाज की प्रमुख जातियों में कुर्मी समाज बहुत ही प्रभावशाली समाज माना जाता है। उत्तर प्रदेश की राजनीति में प्रदेश के दर्जनों विधानसभा सीटों पर कुर्मी समाज की महत्वपूर्ण भूमिका है।

स्वर्गीय बेनी प्रसाद वर्मा

कद्दावर नेता कई बार सांसद विधायक और केंद्र व राज्य की सरकारों में मंत्री रहे स्वर्गीय बेनी प्रसाद वर्मा ने लंबे समय तक मध्य और पूर्वी उत्तर प्रदेश की सियासत के सबसे बड़े कुर्मी नेता के रूप में पूरे प्रभाव के साथ काम किया सभी दलों में उनका सम्मान होता था समाजवादी पार्टी और कांग्रेस में वह काफी ताकतवर रहे । उत्तर प्रदेश और केंद्र में सरकार किसी की भी हो बाराबंकी समेत कई जनपदों में बेनी बाबू के प्रभाव से इनकार नहीं किया जा सकता था। बाराबंकी और आसपास के जनपदों में उन्हें सियासत का पितामह माना जाता था उनके पीछे चलने वाले बहुत से लोग उनकी कृपा से विधायक व मंत्री बने लेकिन समय का चक्र ऐसा घूमा की आज बाराबंकी जनपद में स्वर्गीय बेनी प्रसाद वर्मा के परिवार से कोई भी व्यक्ति प्रदेश और देश के सदन का सदस्य नहीं है।

बेनी प्रसाद वर्मा को लोग संपूर्ण कुर्मी समाज का संरक्षक भी मानते थे हालांकि वह जातिवादी नहीं थे और सभी जातियों के लोगों का सम्मान करते थे । उनसे जुड़े पुराने लोग बताते हैं कि बेनी बाबू अगर किसी काम से किसी कार्यकर्ता या अपने किसी जानने वाले के लिए अधिकारियों को फोन कर देते थे तो अधिकारियों में हिम्मत नहीं थी कि बहानेबाजी करें और काम ना करें उनके फोन कर देने का मतलब ही होता था कि काम हो गया ।

लेकिन आज बाराबंकी में कोई भी नेता इस हालत में नहीं दिखाई पड़ता। कुर्मी समाज का उनसे एक भावनात्मक लगाव था जो आज भी उनके परिवार से बना हुआ है लेकिन उनके जाने के बाद उनके परिवार की सियासत में पकड़ कमजोर होती दिख रही है।

2022 के विधानसभा चुनाव में अखिलेश यादव ने अनुभवी नेताओं की सलाह ना मानते हुए एक अजीबोगरीब निर्णय ले डाला था, स्वर्गीय बेनी प्रसाद वर्मा के बेटे राकेश वर्मा और पूर्व मंत्री अरविंद सिंह गोप के टिकट का ऐसा फैसला किया कि अरविंद सिंह गोप भी चुनाव हार गए और राकेश वर्मा भी चुनाव हार गए ।

पूर्व मंत्री राकेश वर्मा – पूर्व मंत्री अरविंद सिंह गोप

कुर्सी विधानसभा से भाजपा से सजातीय प्रत्याशी साकेंद्र वर्मा ने पूर्व मंत्री राकेश वर्मा को मामूली वोटों से चुनाव हरा दिया और प्रदेश में दोबारा सत्ता से वंचित होने के वजह से सपा के कार्यकर्ताओं और राकेश वर्मा के समर्थकों को भी झटका लगा।

अब बाराबंकी में कुर्मी समाज के बहुत से लोगों के दिलों में सवाल खड़ा होता है कि कुर्मी समाज का नेतृत्व अब कौन करेगा? कुर्मी समाज के लोगों को उचित संरक्षण कौन प्रदान करेगा?

साकेंद्र वर्मा, बीजेपी विधायक

भाजपा की ओर से साकेंद्र वर्मा कुर्सी विधानसभा का चुनाव जीते हैं उन्होंने मामूली वोटों से राकेश वर्मा को चुनाव हराने में सफलता हासिल की है लेकिन उनका प्रभाव केवल कुर्सी विधानसभा तक सीमित माना जाता है जनपद बाराबंकी के नेता के रूप में वह खुद को स्थापित करने से अभी काफी दूर है ।

राकेश वर्मा, स्वर्गीय बेनी प्रसाद वर्मा के पुत्र

चुनाव हारने के बावजूद राकेश वर्मा का जनपद के कुर्मी समाज में प्रभाव होने से इनकार नहीं किया जा सकता क्योंकि उनके स्वर्गीय पिता का अभी भी बहुत सम्मान है लेकिन इतना जरूर है कि सियासत में राकेश वर्मा की पकड़ कमजोर हुई है। राकेश वर्मा रामनगर विधानसभा से चुनाव लड़ना चाहते थे लेकिन अखिलेश यादव ने टिकट नहीं दिया अखिलेश यादव ने उन्हें कुर्सी विधानसभा से लड़ा दिया जहां से वह चुनाव हार गए।

इसके पहले 2007 में वह बेनी बाबू की पार्टी समाजवादी क्रांति दल से चुनाव लड़े थे और मसौली विधानसभा में फरीद किदवाई से चुनाव हार गए थे 2012 में वह कांग्रेस के टिकट पर दरियाबाद से चुनाव लड़े थे लेकिन राजा राजीव कुमार सिंह से हार गए थे 2017 का चुनाव इसलिए नहीं लड़े क्योंकि उन्हें सपा ने उचित स्थान से टिकट नहीं दिया और 22 का चुनाव एक बार फिर उनके समर्थकों के लिए निराशा लेकर आया।

डॉo विवेक सिंह वर्मा

इसी विधानसभा चुनाव के दौरान बाराबंकी की सियासत में डॉक्टर विवेक सिंह वर्मा का प्रभावशाली पदार्पण हुआ है । कई दशकों से नेत्र चिकित्सा के क्षेत्र में लोगों की सेवा करके हजारों दिलों में मजबूत जगह बनाने वाले डॉ विवेक सिंह वर्मा अपनी सज्जनता अच्छे व्यवहार और समाज सेवा के कार्यों के लिए जाने जाते हैं बाराबंकी ही नहीं आसपास के कई जनपदों में उनका प्रभाव है कई जिलों के मरीज और हजारों परिवार उनसे जुड़े हुए हैं ।

उन्होंने अपने जीवन का पहला चुनाव बहुजन समाज पार्टी से लड़ा और नवाबगंज विधानसभा की जटिल राजनीतिक परिस्थितियों के बावजूद सम्मानजनक वोट हासिल किए । बहुत से लोगों की जुबान पर यह बात रही कि डॉ विवेक सिंह वर्मा ने यदि भाजपा या सपा जैसे दलों से टिकट हासिल कर लिया होता तो बड़े अंतर से उनकी जीत पक्की थी। डॉ विवेक सिंह वर्मा चुनाव भले ही हार गए लेकिन उन्होंने बाराबंकी जनपद की सियासत में खुद को नेता के रूप में मजबूती से स्थापित कर लिया खास तौर पर कुर्मी समाज के लोग उन्हें एक उभरते हुए सामाजिक राजनीतिक किरदार के रूप में देख रहे हैं ।

डॉक्टर विवेक सिंह वर्मा भविष्य में सर्व समाज के लोकप्रिय नेता के रूप में स्थापित होने की दिशा में बहुत समझदारी के साथ आगे बढ़ने की कोशिश में है । एक चिकित्सक होने के नाते वह लोगों के मनोविज्ञान को भी समझते हैं और जनता की अपेक्षाओं को भी, हालांकि उनके लिए भी सियासत में बड़ा सफर तय करना बाकी है ।

जनपद बाराबंकी के राजनीतिक परिदृश्य में स्वर्गीय बेनी बाबू के परिवार के अलावा पूर्व मंत्री संग्राम सिंह वर्मा का परिवार, पूर्व विधायक स्वर्गीय राधेश्याम वर्मा का परिवार, पूर्व विधायक राजलक्ष्मी वर्मा,

पूर्व विधायक , राजलक्ष्मी वर्मा

पूर्व एमएलसी स्वर्गीय रामचंद्र बक्श सिंह के परिवार को प्रमुख रूप से कुर्मी समाज के प्रभावशाली राजनीतिक परिवारों के तौर पर देखा जाता है। समाज के कई युवा नेताओं ने भी अलग-अलग दलों में अपनी अच्छी पहचान बनाई है लेकिन अभी वह संघर्षों के दौर में हैं।

संग्राम सिंह वर्मा, पूर्व मंत्री

पूर्व मंत्री संग्राम सिंह वर्मा वयोवृद्ध हो गए हैं और उनके छोटे भाई सुरेंद्र सिंह वर्मा ने एवं उनके परिवार के सियासी नेतृत्व की कमान संभाल ली है उनकी पत्नी कई बार जिला पंचायत अध्यक्ष और वह स्वयं ब्लॉक प्रमुख और जिला पंचायत सदस्य रह चुके हैं हालांकि संग्राम सिंह वर्मा की बेटी भी इस बार विधानसभा चुनाव भाजपा के टिकट पर लड़ना चाह रही थी,

लेकिन टिकट ना मिलने की वजह से ही उनके पूरे परिवार ने भाजपा को अलविदा कह कर उसी समाजवादी पार्टी को गले लगा लिया जिस समाजवादी पार्टी के नेताओं के द्वारा उनके पूरे परिवार को पूर्व विधायक हत्याकांड के कथित आरोप में लंबे समय तक जेल में बंद करवाया गया था।

कुर्मी बाहुल्य जनपद बाराबंकी में कई दशकों के बाद ऐसा देखा गया है कि जिले के कुर्मी समाज की स्थिति सियासी रूप से पहले की तुलना में कमजोर हुई है राज्य और केंद्र के किसी भी सदन में जनपद बाराबंकी से मूल रूप से जुड़े कुर्मी समाज के व्यक्ति की अनुपस्थिति यहां के लोगों को तकलीफ दे रही है।

समय बदलने के साथ ही सियासत का रंग बदलता है और सियासत की जरूरत और रणनीतियां भी बदलती हैं और उन्हीं बदलती हुई जरूरतों के हिसाब से शायद राकेश वर्मा अपनी रणनीतियों को मजबूती नहीं दे पाए।
2007 का विधानसभा चुनाव फरीद महफूज किदवई से हारने के बाद लगातार उनके राजनीतिक समीकरण बिगड़ते ही जा रहे हैं । कुर्मी समाज के बहुत से लोग दबी जुबान में कहते हैं कि पूर्व मंत्री राकेश वर्मा को सियासी दुनिया में खुद को मजबूती से स्थापित करने के लिए नई रणनीति पर विचार करना होगा ।

वही आज शासन-प्रशासन थाना तहसील और अधिकारियों को फोन करवाने के लिए जिले में लंबे समय तक प्रभावशाली रहे कुर्मी समाज के लोगों को सोचना पड़ता है कि किस नेता के पास जाएं? कौन उनके दुख दर्द को दूर करेगा? कौन सरकारी विभागों से उनके काम करवायेगा?

ऐसे में बाराबंकी जनपद का कुर्मी समाज अपने हितों की सुरक्षा के लिए अपने लिए योग्य और प्रभावशाली नेतृत्व की आस में है । यह देखने वाली बात होगी कि भविष्य की सियासत में कुर्मी समाज का कौन सा प्रभावशाली व्यक्तित्व लोगों को उचित नेतृत्व और संरक्षण प्रदान करेगा?

द इंडियन ओपिनियन
बाराबंकी

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