जाने डॉन ब्रजेश सिंह और मुख्तार अंसारी कैसे बने एक-दूसरे के दुश्मन-

मुख्तार अंसारी के सबसे बड़े दुश्मन और डॉन कहलाने वाले ब्रजेश सिंह रिहाई के बाद सुर्खियां में है। मुख्तार अंसारी पर हमले के मामले में हाईकोर्ट से बुधवार को जमानत मिलने के बाद ब्रजेश सिंह 14 साल बाद गुरुवार की शाम जेल से बाहर आ गया। पिता की हत्या के बाद ब्रजेश सिंह अपराध की दुनिया में आया लेकिन मुख्तार अंसारी से अदावत एक कांस्टेबल की हत्या के बाद हुई। इसके बाद दोनों एक दूसरे के सबसे बड़े दुश्मन बन गए।

1884 में पिता के हत्यारों की सनसनीखेज तरीके से हत्या का आरोप ब्रजेश सिंह पर लगा और अपराध की दुनिया में उनकी तूती बोलने लगी थी।
पिता की मौत ने बृजेश सिंह के मन में बदले की भावना को जन्म दे दिया। इसी दौरान ब्रजेश की मुलाकात गाजीपुर के मुडियार गांव के दूसरे माफिया त्रिभुवन सिंह से हुई। 27 मई 1985 को रविंद्र सिंह का हत्यारा हरिहर सिंह बृजेश के सामने आ गया,उसे देखते ही बृजेश ने उसे मौत के घाट उतार दिया। यहीं से उसका क्राइम ग्राफ बढ़ने लगा।

वहीं दूसरी तरफ यूपी के बाहुबली विधायक मुख्तार अंसारी को पूर्वांचल के अपराध जगत में खौफ का पर्याय माना जाता रहा है। 1996 से मुख्तार का मऊ विधानसभा सीट पर कब्जा है। कभी निर्दलीय तो कभी एसपी का साथ तो कभी बीएसपी, पार्टियां बदलने के बावजूद मुख्तार का सियासी रसूख कायम रहा।

1988 में त्रिभुवन के हेड कॉस्टेबल भाई राजेंद्र सिंह की गोली मारकर हत्या कर दी गई। हत्याकांड में साधु सिंह और मुख्तार अंसारी का नाम आया। इस हत्याकांड के पहले तक इन दोनो गैंग के बीच कोई खास दुश्मनी नहीं थी,लेकिन इसके बाद दोनों एक-दूसरे के सबसे बड़े दुश्मन बन गए।

बृजेश सिंह ने साधु सिंह की मां-भाई समेत परिवार के 8 लोगों की मुदियार गांव में हत्या कर दी। साधु सिंह के परिवार की हत्या के बाद ब्रजेश का नाम अपराध की दुनिया के बेताज बादशाह बनने की तरफ तेजी से बढ़ा। आरोप है कि 1992 में ब्रजेश ने गुजरात में रघुनाथ यादव नाम के एक व्यक्ति को गोली मार दी।
ब्रजेश को लेकर जो डर का माहौल बना उसी के बलबूते वह पूर्वांचल के जिलों से निकलकर झारखंड तक पहुंच गए। वह छोटा राजन के सबसे खास अंडरवर्ल्ड डॉन सुभाष ठाकुर से जा मिले।

अब ब्रजेश के पास पैसा भी था और पावर भी, लेकिन वह राजनीतिक रूप से मजबूत नहीं बन पाए थे। वहीं दूसरी तरफ साधु सिंह की हत्या के बाद मुख्तार राजनीति में आकर विधायक बन चुके थे। पुलिस अब मुख्तार के इशारे पर चलती और ब्रजेश को परेशान करती।

अब ब्रजेश समझ गए थे कि बिना राजनीतिक मदद मुख्तार को नहीं हराया जा सकता। इसलिए उन्होंने कृष्णानंद राय का साथ पकड़ा। मुख्तार अंसारी गैंग को ब्रजेश सिंह का बढ़ना अब किसी भी स्थित में मंजूर नहीं था। मुख्तार की राजनीति में रसूख को देखते हुए ब्रजेश सिंह ने भी कई राजनेताओं से संबंध बनाए।
2012 में खुद भी चंदौली की सैयदराजा सीट से विधानसभा का चुनाव लड़ा।

 

ब्यूरो रिपोर्ट ‘द इंडियन ओपिनियन’

 

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