ऐसी महिला स्नाइपर जिसने हिटलर की सेना के कर दिए दांत खट्टे, थर्राते थे नाजी-

ये कहानी उस लड़की की है जिसे इतिहास की सबसे ख़तरनाक निशानेबाज़ का दर्जा हासिल है और जिसने हिटलर की नाज़ी फ़ौज की नाक में दम कर दिया था। सिर्फ़ 25 साल की उम्र में ल्यूडमिला ने 309 लोगों को अपना शिकार बनाया था जिनमें से ज्यादातर हिटलर के सैनिक थे। ल्यूडमिला पेवलीचेंको (जुलाई 12, 1916 – अक्टूबर 10, 1974) द्वितीय विश्व युद्ध के वक्त यूक्रेनियन सोवियत स्नाइपर थीं। ल्यूडमिला को इतिहास की सबसे कामयाब महिला स्नाइपर कहा जाता है।

14 साल की कच्ची उम्र में ल्यूडमिला पवलिचेंको कीव का पाला हथियारों से पड़ा। वो अपने परिवार के साथ यूक्रेन में अपने पैत्रिक गांव से कीव आकर बस गई थीं। हेनरी साकैडा की किताब ‘हीरोइन्स ऑफ़ द सोवियत यूनियन’ के मुताबिक पवलिचेंको एक हथियारों की फ़ैक्ट्री में काम करती थीं। ल्यूडमिला पवलिचेंको ने अपने देश की रक्षा के लिए कीव के विश्वविद्यालय में चल रही इतिहास की पढ़ाई छोड़कर आर्मी में जाने का फ़ैसला किया। आर्मी में पहले तो उन्हें लेने से इनकार कर दिया गया। लेकिन जब उन्होंने निशानेबाज़ी में अपना हुनर दिखाया तो आर्मी वालों ने उन्हें रेड आर्मी के साथ ऑडिशन का मौका दिया।

सेना में रहते हुए उन्होंने ग्रीस और मोलदोवा की लड़ाइयों में हिस्सा लिया. पवलिचेंको ने जल्द ही सेना में खास छवि बना ली। युद्ध के पहले 75 दिनों में ही उन्होंने 187 नाज़ी सैनिकों को मार गिराया। पेवलीचेंको के पास नर्स बनने का ऑप्शन भी था, लेकिन उन्होंने इससे इनकार कर दिया। इसके बाद वह रेड आर्मी की 2 हजार महिला स्नाइपर्स में से एक बनीं. इनमें से युद्ध के बाद 500 ही जीवित बचीं. उन्होंने सबसे पहले बेल्यायेवका में दो लोगों को मारा।

द्वितीय विश्व युद्ध में उनके द्वारा प्रमाणिक हत्याओं की संख्या 309 है और इसमें दुश्मन देश के 36 स्नाइपर्स भी हैं। पेवलीचेंको ने ओडेसा के पास ढाई साल तक लड़ाई लड़ी, जहां उन्होंने 187 लोगों को मारा था. जब रोमानिया को ओडेसा पर नियंत्रण मिल गया, तब उनकी यूनिट को सेवासटोपोल भेजा गया। यहां पेवलीचेंको ने 8 महीने तक लड़ाई लड़ी. मई 1942 तक लेफ्टिनेंट पेवलीचेंको 257 जर्मन सैनिकों को मार चुकी थीं।

युद्ध में उन्हें कई चोटें आईं, लेकिन उन्होंने तब तक मैदान नहीं छोड़ा, जब तक नाज़ी आर्मी ने उनकी पोज़ीशन को बम से उड़ा नहीं दिया और उन्हें चेहरे पर गंभीर चोटें आईं। कई उपलब्धियों के चलते उन्हें लेफ़्टिनेंट पद पर पदोन्नति मिली और उन्होंने दूसरे निशानेबाज़ों को ट्रेनिंग देना शुरू कर दिया. कुछ दिनों बाद ही उन्हें वॉशिंगटन भेजा गया।

 

ब्यूरो रिपोर्ट ‘द इंडियन ओपिनियन’

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