
भारत में जाति आधारित आरक्षण एक बार फिर राष्ट्रीय बहस का केंद्र बन गया है। एक ओर इसे सामाजिक न्याय और समान अवसर का सबसे बड़ा माध्यम बताया जाता है, तो दूसरी ओर आरक्षण की सीमा, क्रीमी लेयर और जातीय जनगणना जैसे मुद्दों पर नई चर्चाएं तेज़ हैं। सुप्रीम कोर्ट में भी इससे जुड़े कई मामलों पर सुनवाई जारी है।

देश में वर्तमान आरक्षण व्यवस्था क्या है?
केंद्र सरकार की नौकरियों और केंद्रीय शिक्षण संस्थानों में वर्तमान आरक्षण व्यवस्था इस प्रकार है—
अनुसूचित जाति (SC): 15%
अनुसूचित जनजाति (ST): 7.5%
अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC): 27%
आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS): 10%
यानी कई केंद्रीय संस्थानों में कुल आरक्षण लगभग 59.5% तक पहुंचता है। हालांकि राज्यों में यह प्रतिशत अलग-अलग हो सकता है।

2026 में सबसे बड़ी बहस किन मुद्दों पर है?
1. जातीय जनगणना
देश में आगामी जनगणना में जातीय आंकड़ों को लेकर राजनीतिक और सामाजिक बहस तेज़ है। विपक्ष ने जनगणना की प्रक्रिया और प्रश्नावली पर सवाल उठाए हैं और OBC की स्पष्ट गणना की मांग की है।
2. क्रीमी लेयर विवाद
सुप्रीम कोर्ट में यह मुद्दा भी चर्चा में है कि क्या भविष्य में SC/ST आरक्षण में भी “क्रीमी लेयर” जैसी व्यवस्था लागू होनी चाहिए। केंद्र सरकार ने अदालत में कहा है कि फिलहाल SC/ST पर OBC जैसी क्रीमी लेयर लागू नहीं होनी चाहिए, क्योंकि उनके आरक्षण का आधार ऐतिहासिक और सामाजिक भेदभाव है।
3. उप-वर्गीकरण (Sub-classification)
सुप्रीम कोर्ट के 2024 के फैसले के बाद राज्यों को SC/ST वर्गों के भीतर अधिक वंचित समुदायों के लिए उप-वर्गीकरण करने का संवैधानिक रास्ता मिला है। यह विषय अभी भी कई राज्यों में नीति निर्माण का हिस्सा बना हुआ है।
समर्थकों का पक्ष
समर्थकों का कहना है कि:
- सदियों के सामाजिक भेदभाव की भरपाई के लिए आरक्षण आवश्यक है।
- शिक्षा और सरकारी नौकरियों में प्रतिनिधित्व बढ़ाने का यह प्रभावी माध्यम है।
- समान अवसर सुनिश्चित करने के लिए आरक्षण अभी भी प्रासंगिक है।
विरोध करने वालों का पक्ष
विरोध करने वालों का तर्क है कि:
- आरक्षण की समय-समय पर समीक्षा होनी चाहिए।
- आर्थिक रूप से कमजोर सभी वर्गों को समान अवसर मिलना चाहिए।
- शिक्षा, कौशल विकास और रोजगार सृजन पर अधिक ध्यान दिया जाना चाहिए।