ओलंपिक का सपना अधूरा, कॉमनवेल्थ में जसपाल राणा बने गोल्डन हीरो

18 साल की उम्र में एशियन गेम्स गोल्ड, फिर कॉमनवेल्थ में दिखाया दम।

भारतीय शूटिंग जगत के दिग्गज निशानेबाज और कोच Jaspal Rana का नाम देश के सबसे सफल शूटर्स में गिना जाता है। भले ही वह अपने करियर में ओलंपिक पदक नहीं जीत सके, लेकिन कॉमनवेल्थ गेम्स और एशियन गेम्स में उनके प्रदर्शन ने भारतीय खेल इतिहास में उन्हें अमर बना दिया।

जसपाल राणा का जन्म 28 जून 1976 को उत्तराखंड के उत्तरकाशी में हुआ था। उनके पिता नारायण सिंह राणा स्वयं खेलों से जुड़े रहे और उन्होंने ही जसपाल को शूटिंग की शुरुआती ट्रेनिंग दी। बेहद कम उम्र में ही जसपाल ने अपनी प्रतिभा से दुनिया का ध्यान आकर्षित कर लिया था।

साल 1994 में मात्र 18 वर्ष की उम्र में उन्होंने हिरोशिमा एशियन गेम्स में 25 मीटर सेंटर फायर पिस्टल स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीतकर भारत का नाम रोशन किया। उसी वर्ष उन्हें अर्जुन पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया।

कॉमनवेल्थ गेम्स में जसपाल राणा का रिकॉर्ड आज भी शानदार माना जाता है। उन्होंने 1994 से 2006 के बीच चार कॉमनवेल्थ गेम्स में कुल 15 पदक जीते, जिनमें 9 स्वर्ण, 4 रजत और 2 कांस्य पदक शामिल हैं। इसी वजह से उन्हें भारत के सबसे सफल कॉमनवेल्थ एथलीटों में गिना जाता है।

हालांकि, उनके करियर का एक बड़ा अफसोस ओलंपिक पदक न जीत पाना रहा। उन्होंने 1996 अटलांटा ओलंपिक सहित कई अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भारत का प्रतिनिधित्व किया, लेकिन ओलंपिक पोडियम तक नहीं पहुंच सके।

खिलाड़ी के रूप में सफलता के बाद जसपाल राणा ने कोचिंग की जिम्मेदारी संभाली। उन्होंने कई युवा निशानेबाजों को तराशा, जिनमें भारतीय स्टार शूटर Manu Bhaker भी शामिल हैं। माना जाता है कि मनु भाकर की सफलता के पीछे जसपाल राणा की कोचिंग और मार्गदर्शन की बड़ी भूमिका रही।

उनके योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें अर्जुन पुरस्कार, पद्मश्री और बाद में द्रोणाचार्य पुरस्कार से सम्मानित किया। खेल जगत में उनका नाम एक ऐसे खिलाड़ी और कोच के रूप में लिया जाता है जिसने भारतीय शूटिंग को नई पहचान दिलाई।

जसपाल राणा का संघर्ष, अनुशासन और देश के लिए जीतने का जज्बा आने वाली पीढ़ियों के लिए हमेशा प्रेरणा बना रहेगा। उनके नाम दर्ज उपलब्धियां भारतीय खेल इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में लिखी जाएंगी।

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