मक्का डिफेंस पैक्ट भारत के लिए कितना बड़ा खतरा? पुतिन के दौरे से पहले रूस ने दिया अहम जवाब
भारत और रूस के बीच रणनीतिक रिश्तों के बीच मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट को लेकर नई चर्चा शुरू हो गई है। सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की ने 7 अगस्त 2026 को इस रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। समझौते के तहत किसी एक सदस्य पर सशस्त्र हमला होने की स्थिति को तीनों देशों पर हमला माना जाएगा।
पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की के इस नए सुरक्षा ढांचे को लेकर भारत में रणनीतिक चिंताएं स्वाभाविक हैं, खासकर इसलिए क्योंकि पाकिस्तान इस समझौते का हिस्सा है। लेकिन इसी बीच रूस ने इस पूरे घटनाक्रम को लेकर भारत के सामने एक अलग नजरिया रखा है।

रूस ने क्या कहा?
रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के भारत दौरे से पहले 8 सितंबर को Kremlin के प्रेस सचिव दिमित्री पेस्कोव ने भारतीय मीडिया से बातचीत में मक्का पैक्ट पर प्रतिक्रिया दी।
पेस्कोव ने इसे सीधे तौर पर भारत के खिलाफ खतरा नहीं बताया। उन्होंने कहा कि यह समझौता भविष्य में क्षेत्रीय स्थिरता का एक महत्वपूर्ण स्तंभ बन सकता है। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि यह समझौता अभी नया है और इसका स्वरूप आगे विकसित होना बाकी है।
रूस की ओर से यह प्रतिक्रिया इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत और रूस के बीच दशकों पुराने रक्षा संबंध हैं, जबकि रूस के पाकिस्तान और तुर्की के साथ भी अपने रणनीतिक रिश्ते लगातार बढ़ रहे हैं।
आखिर क्या है मक्का डिफेंस पैक्ट?
Makkah Joint Defence Agreement पर 7 अगस्त 2026 को सऊदी अरब के मक्का में सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान, तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप एर्दोगन और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने हस्ताक्षर किए।
इस समझौते का सबसे महत्वपूर्ण प्रावधान यह है कि तीनों देशों में से किसी एक पर सशस्त्र हमला होने पर उसे तीनों देशों पर हमला माना जाएगा। इसका उद्देश्य सामूहिक सुरक्षा और प्रतिरोध क्षमता को मजबूत करना बताया गया है।
31 अगस्त को इस्तांबुल में इस समझौते के तहत Strategic Political and Defence Committee की पहली बैठक भी हुई। तीनों देशों ने रक्षा सहयोग को संस्थागत रूप देने और रक्षा उद्योग, संयुक्त उत्पादन तथा तकनीकी सहयोग बढ़ाने की दिशा में आगे बढ़ने की बात कही।
क्या यह भारत के खिलाफ बनाया गया गठबंधन है?
फिलहाल ऐसा कहना जल्दबाजी होगी।
मक्का समझौते में भारत का नाम किसी लक्ष्य के रूप में नहीं लिया गया है। पाकिस्तान भी लगातार इसे किसी खास देश के खिलाफ बनाया गया समझौता नहीं, बल्कि सामूहिक सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता के लिए बनाया गया रक्षा ढांचा बताता रहा है।
हालांकि, भारत के लिए चिंता की वजह पाकिस्तान की भागीदारी है। अगर भविष्य में इस सुरक्षा ढांचे का विस्तार होता है और इसमें दूसरे क्षेत्रीय देश भी शामिल होते हैं, तो इससे पश्चिम एशिया और दक्षिण एशिया की रणनीतिक गणित प्रभावित हो सकती है।
यही वजह है कि भारत इस घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए है।
रूस का रुख क्यों महत्वपूर्ण है?
रूस की स्थिति इस पूरे समीकरण में काफी दिलचस्प है। एक तरफ मॉस्को भारत के साथ अपने Special and Privileged Strategic Partnership को मजबूत करना चाहता है। दूसरी तरफ रूस पाकिस्तान और तुर्की के साथ भी अपने संबंधों को आगे बढ़ा रहा है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की 11 सितंबर को नई दिल्ली में द्विपक्षीय बैठक प्रस्तावित है। इस बातचीत में रक्षा, ऊर्जा, व्यापार और रणनीतिक सहयोग प्रमुख मुद्दों में शामिल रहने की उम्मीद है।
रक्षा क्षेत्र में Su-57 फाइटर जेट, तकनीकी सहयोग और BrahMos के संभावित अपग्रेड जैसे मुद्दे चर्चा में हैं।
ऐसे समय में रूस का मक्का पैक्ट को लेकर अपेक्षाकृत संतुलित रुख यह संकेत देता है कि मॉस्को इसे तुरंत किसी anti-India alliance के रूप में नहीं देख रहा।
क्या ईरान भी शामिल हो सकता है?
मक्का पैक्ट का भविष्य केवल तीन देशों तक सीमित रहेगा या इसका विस्तार होगा, यह अभी स्पष्ट नहीं है।
रूस ने संकेत दिया है कि ईरान की संभावित भागीदारी क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए उपयोगी हो सकती है। पेस्कोव ने कहा कि अगर यह समझौता वास्तव में क्षेत्रीय सुरक्षा में योगदान देता है, तो महत्वपूर्ण क्षेत्रीय खिलाड़ियों की भागीदारी का स्वागत किया जा सकता है। उन्होंने साथ ही यह भी कहा कि समझौता अभी नया है और आगे विकसित होना बाकी है।
इसका मतलब है कि आने वाले समय में इस समझौते का स्वरूप मौजूदा तीन देशों से कहीं बड़ा हो सकता है—हालांकि अभी किसी नए सदस्य की औपचारिक सदस्यता को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है।
पुतिन के भारत दौरे पर क्यों टिकी हैं नजरें?
पुतिन का भारत दौरा ऐसे समय हो रहा है जब वैश्विक और क्षेत्रीय समीकरण तेजी से बदल रहे हैं। भारत एक तरफ रूस के साथ अपने पुराने रक्षा और ऊर्जा संबंधों को जारी रख रहा है, वहीं अमेरिका और यूरोप के साथ भी रणनीतिक साझेदारी मजबूत कर रहा है।
31 अगस्त को मोदी और पुतिन की बिश्केक में मुलाकात के दौरान दोनों नेताओं ने रक्षा, ऊर्जा, व्यापार, अंतरिक्ष और अन्य क्षेत्रों में द्विपक्षीय सहयोग की समीक्षा की थी। मोदी ने पुतिन को सितंबर में भारत आने का निमंत्रण भी दिया था।
अब नई दिल्ली में होने वाली बैठक में दोनों देशों के रिश्तों के साथ-साथ बदलते क्षेत्रीय सुरक्षा समीकरण पर भी नजर रहेगी।
भारत के लिए आगे की चुनौती क्या है?
मक्का डिफेंस पैक्ट को लेकर भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती किसी तत्काल सैन्य खतरे से ज्यादा बदलते रणनीतिक समीकरण को समझने और उसके अनुसार अपनी विदेश एवं सुरक्षा नीति को संतुलित रखने की है।
भारत को पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की के बीच बढ़ते रक्षा सहयोग पर नजर रखनी होगी। साथ ही रूस के पाकिस्तान और तुर्की के साथ बढ़ते संबंधों को भी भारत-रूस संबंधों के व्यापक संदर्भ में देखना होगा।
हालांकि अभी यह कहना कि मक्का डिफेंस पैक्ट सीधे तौर पर भारत के खिलाफ है, उपलब्ध तथ्यों से साबित नहीं होता।
निष्कर्ष
मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट पश्चिम एशिया और दक्षिण एशिया के सुरक्षा समीकरण में एक नया अध्याय जरूर जोड़ता है। पाकिस्तान की भागीदारी इसे भारत के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बनाती है, लेकिन इसे फिलहाल सीधे तौर पर भारत-विरोधी सैन्य गठबंधन कहना सही नहीं होगा।
रूस ने भी भारत की चिंताओं के बीच इसे क्षेत्रीय स्थिरता के संभावित स्तंभ के रूप में देखने की बात कही है और जल्दबाजी में निष्कर्ष न निकालने का संकेत दिया है।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि मक्का पैक्ट आगे कितना विस्तार करता है और क्या इसमें ईरान या अन्य क्षेत्रीय देश शामिल होते हैं। इसका जवाब आने वाले महीनों में पश्चिम एशिया और दक्षिण एशिया की रणनीतिक तस्वीर को काफी प्रभावित कर सकता है।
आपके हिसाब से मक्का डिफेंस पैक्ट भारत के लिए चिंता का विषय है या इसे लेकर अभी इंतजार करना ज्यादा सही होगा?