हर साल नदियां उफनती हैं, गांव डूबते हैं और राहत की नावें निकलती हैं,फिर भी हमारी तैयारी अगले साल का इंतजार क्यों करती है?
नई दिल्ली। देश के कई हिस्से इस समय बाढ़ की विभीषिका से जूझ रहे हैं। कहीं घरों में पानी है, कहीं खेत जलमग्न हैं और कहीं सड़कें संपर्क का माध्यम नहीं, बल्कि बहते पानी की धारा बन गई हैं। प्रशासन राहत और बचाव में जुटा है, लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया जा रहा है। लेकिन इन दृश्यों के बीच एक सवाल बार-बार सामने आता है – क्या बाढ़ की हर तबाही को केवल प्राकृतिक आपदा मानकर हम अपनी जिम्मेदारी से बच सकते हैं?

भारत में बाढ़ कोई अनजान घटना नहीं है। लगभग हर वर्ष मानसून के साथ कुछ नदियां खतरे के निशान से ऊपर जाती हैं और वही क्षेत्र फिर प्रभावित होते हैं। इसके बावजूद हमारी तैयारी का बड़ा हिस्सा पानी आने के बाद शुरू होता दिखाई देता है ,राहत शिविर, नावें, भोजन और बचाव दल। बाढ़ आने से पहले जल निकासी, नदी क्षेत्र की सुरक्षा, अतिक्रमण पर रोक और सुरक्षित स्थानों की स्थायी व्यवस्था कितनी प्रभावी है? यही असली सवाल है।
नदी को उसकी प्राकृतिक धारा के लिए जगह नहीं मिलेगी, जल निकासी के रास्ते बंद होंगे, बाढ़ क्षेत्र में निर्माण होता रहेगा और वर्षा जल को रोकने या सुरक्षित निकालने की समुचित व्यवस्था नहीं होगी, तो अत्यधिक बारिश का नुकसान बढ़ना स्वाभाविक है। प्रकृति पर हमारा नियंत्रण नहीं हो सकता, लेकिन उसके प्रभाव को कम करने की जिम्मेदारी तो हमारी है।
हर साल बाढ़ के बाद नुकसान का आकलन होता है, मुआवजे की घोषणा होती है और राहत पहुंचाई जाती है। लेकिन क्या कभी उसी गंभीरता से यह आकलन होता है कि अगले वर्ष यही नुकसान दोबारा न हो, इसके लिए क्या स्थायी उपाय किए गए? यदि वही गांव, वही सड़कें और वही खेत बार-बार डूब रहे हैं, तो केवल राहत पहुंचाना समाधान नहीं, समस्या को अगले वर्ष के लिए टालना है।
बाढ़ को रोकना शायद हमारे हाथ में नहीं, लेकिन बाढ़ को हर साल त्रासदी बनने से रोकना निश्चित रूप से हमारी जिम्मेदारी है।
सवाल यह नहीं कि इस वर्ष कितना पानी आया। सवाल यह है कि पिछले वर्षों की बाढ़ से हमने कितना सीखा और अगली बाढ़ से पहले कितना बदला?
रिपोर्ट-विकास चन्द्र अग्रवाल