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अधिवक्ता अजीत कुमार के तर्कों पर हाईकोर्ट का बड़ा आदेश, पूर्व विधायक को राहत एफआईआर-चार्जशीट निरस्त!

लखनऊ। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने बाराबंकी में वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव के दौरान कोविड-19 गाइडलाइन और आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन के आरोप में दर्ज आपराधिक मामले में महत्वपूर्ण आदेश पारित किया है।

न्यायमूर्ति सुभाष विद्यार्थी ने रोहितास दीक्षित व दो अन्य की ओर से दाखिल धारा 482 सीआरपीसी की याचिका स्वीकार करते हुए उनके विरुद्ध चल रही आपराधिक कार्यवाही को निरस्त कर दिया। मामला थाना कोतवाली, बाराबंकी में 7 फरवरी 2022 को दर्ज केस क्राइम संख्या 125/2022 से संबंधित था। आरोप था कि भाजपा प्रत्याशी पूर्व विधायक शरद अवस्थी के समर्थन में 200-300 लोग बिना पूर्व अनुमति के चुनाव प्रचार कर रहे थे और नामांकन के दौरान कोविड-19 संबंधी निर्धारित सीमा का भी पालन नहीं किया गया।

याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता अजीत कुमार ने हाईकोर्ट में तर्क दिया कि एफआईआर में धारा 171एच और धारा 188 आईपीसी समेत अन्य धाराएं लगाई गई थीं, लेकिन धारा 171एच गैर-संज्ञेय अपराध है। साथ ही धारा 195(1) सीआरपीसी के तहत धारा 172 से 188 आईपीसी के अपराधों में संबंधित लोक सेवक की लिखित शिकायत के बिना न्यायालय संज्ञान नहीं ले सकता। उनका कहना था कि पुलिस को इस मामले में सीधे एफआईआर दर्ज कर विवेचना करने के बजाय संबंधित मजिस्ट्रेट के समक्ष शिकायत की प्रक्रिया अपनानी चाहिए थी।

यह भी तर्क दिया गया कि धारा 155(2) सीआरपीसी के तहत गैर-संज्ञेय अपराध की विवेचना के लिए मजिस्ट्रेट की पूर्व अनुमति आवश्यक थी, जो मामले में नहीं ली गई।
**मामले में विवेचना के बाद पुलिस ने 8 अप्रैल 2022 को आरोपपत्र संख्या 202/2022 दाखिल किया। इसके आधार पर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, कोर्ट संख्या 18, बाराबंकी ने 2 सितंबर 2023 को संज्ञान लेते हुए आरोपितों को तलब किया। इसके बाद याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट में धारा 482 सीआरपीसी के तहत आवेदन संख्या 2168/2024 दाखिल कर समन आदेश, चार्जशीट और पूरी आपराधिक कार्यवाही को चुनौती दी। याचिकाकर्ताओं ने यह भी कहा कि धारा 171एच के तहत अपराध स्वयं उम्मीदवार के विरुद्ध नहीं बनता और उनके खिलाफ लगाए गए आरोपों से भी उक्त अपराध के आवश्यक तत्व स्थापित नहीं होते। राज्य की ओर से एजीए ने याचिका का विरोध करते हुए समन आदेश को उचित बताया।

हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड और दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार करते हुए पाया कि धारा 171एच आईपीसी गैर-संज्ञेय और जमानतीय अपराध है तथा पुलिस ने मजिस्ट्रेट की पूर्व अनुमति के बिना इसकी विवेचना की। न्यायालय ने सुप्रीम कोर्ट के Sachida Nand Singh, Daulat Ram और M.S. Ahlawat के फैसलों का उल्लेख करते हुए कहा कि धारा 195 सीआरपीसी की अनिवार्यता का पालन किया जाना जरूरी है। अदालत ने यह भी पाया कि एफआईआर और चार्जशीट में ऐसा कोई संज्ञेय अपराध सामने नहीं आता जिससे पुलिस को गैर-संज्ञेय अपराधों की भी विवेचना करने का अधिकार मिल सके। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने चार्जशीट, समन आदेश और याचिकाकर्ताओं के विरुद्ध लंबित आपराधिक कार्यवाही को निरस्त कर दिया।

Report : The Indian Opinion

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