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कृषि कानून धर्मेंद्र प्रधान CEC, नैरेटिव अटैक से पस्त BJP! उसी पप्पू ने मोदी का मनोबल तोड़ दिया है?

2014 का लोकसभा चुनाव राहुल गांधी और कांग्रेस के लिए राजनीतिक रूप से बेहद कठिन दौर की शुरुआत थी। कांग्रेस सिर्फ 44 सीटों पर सिमट गई और उसका राष्ट्रीय वोट शेयर लगभग 19.5 प्रतिशत रहा। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा को 282 सीटें मिलीं। इसके बाद राहुल गांधी के सामने केवल चुनाव जीतने की चुनौती नहीं थी, बल्कि अपनी पार्टी राजनीतिक विश्वसनीयता को दोबारा स्थापित करने की चुनौती भी थी। अगले दस वर्षों में उनकी राजनीति कई चरणों से गुजरी—संसद के आक्रामक विपक्ष से लेकर सड़क के आंदोलन, ‘चौकीदार चोर है’ जैसे चुनावी नारों, किसानों और बेरोजगारी के मुद्दों तथा अंततः भारत जोड़ो यात्राओं तक।

पहला बड़ा चरण था—मोदी सरकार की आर्थिक और राजनीतिक नीतियों पर सीधा हमला। नोटबंदी, जीएसटी, बेरोजगारी, किसानों की परेशानी और राफेल सौदा राहुल गांधी के प्रमुख हमलावर मुद्दे बने। 2018 के अविश्वास प्रस्ताव में भी उन्होंने राफेल, रोजगार, कृषि संकट और संस्थाओं को लेकर सरकार पर सवाल उठाए। 2019 के चुनाव में राफेल उनके अभियान का केंद्रीय मुद्दा बना और इसी दौर में ‘चौकीदार चोर है’ नारा कांग्रेस के सबसे चर्चित राजनीतिक नारों में शामिल हुआ। हालांकि इन मुद्दों का 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को बड़ा चुनावी लाभ नहीं मिला—कांग्रेस 44 से बढ़कर केवल 52 सीटों तक पहुंची और वोट शेयर लगभग 19.5 प्रतिशत ही रहा।

दूसरा चरण किसानों, युवाओं और सामाजिक-आर्थिक असमानता के मुद्दों का था। किसान आंदोलन के दौरान राहुल गांधी ने किसानों के पक्ष में राजनीतिक समर्थन दिया। बेरोजगारी को उन्होंने लगातार राष्ट्रीय बहस का विषय बनाया। 2019 में कांग्रेस ने NYAY के जरिए न्यूनतम आय की गारंटी का प्रस्ताव रखा और सरकारी नौकरियों के खाली पद भरने का मुद्दा उठाया। बाद के वर्षों में जातीय जनगणना, ‘भागीदारी’, महंगाई और बेरोजगारी उनके भाषणों के प्रमुख विषय बन गए। भारत जोड़ो न्याय यात्रा में भी राहुल ने बेरोजगारी, महंगाई और सामाजिक प्रतिनिधित्व को केंद्रीय मुद्दे के रूप में पेश किया। सत्ता पक्ष राहुल को पप्पू कहकर उनका मजाक उड़ाता रहा और राहुल गांधी अपने मिशन में लग रहे लगातार पूरे देश में मेहनत करते रहे और आखिरकार उनके लिए देश के बौद्धिक वर्ग में भी स्वीकार्यता बढ़ने लगी।

तीसरा और शायद सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक प्रयोग था—भारत जोड़ो यात्रा। सितंबर 2022 से जनवरी 2023 तक कन्याकुमारी से कश्मीर तक लगभग 4,000 किलोमीटर की यात्रा ने राहुल गांधी की सार्वजनिक छवि को नया आयाम दिया। इसके बाद 2024 में मणिपुर से मुंबई तक भारत जोड़ो न्याय यात्रा हुई। दोनों यात्राओं का उद्देश्य केवल चुनावी प्रचार नहीं था; राहुल ने इन्हें बेरोजगारी, महंगाई, सामाजिक सद्भाव, किसानों और युवाओं के सवालों से जोड़ने की कोशिश की। चुनावी आंकड़ों में भी इन यात्राओं के रास्ते की लोकसभा सीटों पर कांग्रेस और उसके सहयोगियों के प्रदर्शन में सुधार दिखाई देता है।

मीडिया विश्लेषण के अनुसार दोनों यात्राओं से गुजरने वाली 153 लोकसभा सीटों में कांग्रेस और उसके सहयोगियों ने 2024 में 2019 की तुलना में कुल 41 सीटों का सुधार किया। हालांकि इसे केवल यात्रा का परिणाम मानना उचित नहीं होगा, क्योंकि गठबंधन और उम्मीदवारों की स्थिति भी बदली थी।

चौथा बड़ा मुद्दा राष्ट्रीय सुरक्षा और चीन की सीमा का रहा। राहुल गांधी ने गलवान के बाद से चीन के साथ सीमा विवाद और वास्तविक नियंत्रण रेखा की स्थिति को लगातार उठाया। भारत जोड़ो यात्रा के दौरान उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार चीन के खतरे और सीमा पर कथित अतिक्रमण को पर्याप्त रूप से सामने नहीं ला रही है। सरकार ने उनके आरोपों को स्वीकार नहीं किया लेकिन भारतीयों के मन में देश की आंतरिक और बाह्य सुरक्षा को लेकर कुछ सवाल जरूर खड़े हुए खास तौर पर घुसपैठ और जनसंख्या और असंतुलन को लेकर भी लोगों की चिंताएं बढ़ी हांलाकि यह विपक्ष का मुद्दा नहीं था लेकिन सुरक्षा से जुड़ा विषय जरूर है और देश की सुरक्षा को बड़ा मुद्दा बनाकर ही मोदी सरकार ने जनता का समर्थन हासिल किया था। तो यहां बिल राहुल लाभ की स्थिति में रहे।

पांचवां और 2024 में निर्णायक रूप से उभरा मुद्दा संविधान, संस्थाएं और प्रतिनिधित्व:

संविधान को कमजोर करना तानाशाही लागू करना चुनावी प्रणाली की निष्पक्षता को समाप्त करना जातीय जनगणना, सामाजिक हिस्सेदारी और अन्य संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता राहुल गांधी के राजनीतिक भाषण और सत्ता प्राप्ति के विमर्श का महत्वपूर्ण हिस्सा बने। 2024 में ‘संविधान बचाओ’ और सामाजिक न्याय का संदेश कांग्रेस तथा INDIA गठबंधन के अभियान का प्रमुख हिस्सा बना। इसका चुनावी परिणाम 2014 और 2019 की तुलना में कांग्रेस के लिए स्पष्ट रूप से बेहतर रहा।

कांग्रेस 2024 में 99 लोकसभा सीटों तक पहुंची और उसका वोट शेयर लगभग 21.4 प्रतिशत रहा। यानी 2014 के मुकाबले 55 सीटों की वृद्धि और लगभग दो प्रतिशत अंक का वोट-शेयर सुधार हुआ। आंकड़ों में राहुल गांधी के दशक की राजनीति लोकसभा चुनाव कांग्रेस सीटें वोट शेयर 2014 44 लगभग 19.5% 2019 52 लगभग 19.5% 2024 99 लगभग 21.4% 2024 की 99 सीटें 2014 की तुलना में कांग्रेस के लिए महत्वपूर्ण पुनरुत्थान थीं, लेकिन यह भी ध्यान रखना चाहिए कि 2014 से 2024 के बीच कांग्रेस अभी भी 2009 के 206 लोकसभा सदस्यों के स्तर से काफी नीचे थी। इसलिए इसे ‘पूर्ण वापसी’ कहना आंकड़ों से अधिक बड़ा निष्कर्ष होगा।
राज्यसभा में भी तस्वीर महत्वपूर्ण है। 2014 के आसपास कांग्रेस के 69 सदस्य थे; 2019 के चुनावी चक्र के बाद पार्टी की संख्या 46 रह गई और अगस्त 2024 के बाद कांग्रेस की संख्या 27 थी। यानी लोकसभा में 2024 का सुधार होने के बावजूद राज्यसभा में कांग्रेस की स्थिति 2014 की तुलना में काफी कमजोर रही।

यही इस दस साल की कहानी का सबसे दिलचस्प निष्कर्ष है। राहुल गांधी ने 2014 के बाद अपनी राजनीति को केवल चुनावी भाषणों तक सीमित नहीं रखा। राफेल से लेकर ‘चौकीदार चोर है’, किसानों से लेकर बेरोजगारी, चीन से लेकर जातीय जनगणना और अंततः भारत जोड़ो यात्राओं तक उन्होंने अलग-अलग मुद्दों को विपक्षी राजनीति के बड़े नैरेटिव में जोड़ने की कोशिश की। 2019 में इन प्रयासों का चुनावी परिणाम सीमित रहा, लेकिन 2024 में कांग्रेस की सीटें 52 से बढ़कर 99 हो गईं।
इसलिए 2014 से 2024 तक राहुल गांधी की कोशिशों का ज्यादा सटीक निष्कर्ष यह है कि एक दशक में राहुल गांधी ने विपक्षी राजनीति की अपनी भूमिका और सार्वजनिक राजनीतिक पहचान को काफी हद तक पुनर्गठित किया है सशक्त किया है और निसंदेह उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अपराधी छवि को कमजोर करने की कोशिश में कुछ हद तक सफलता भी हासिल की है जिस मुद्दे पर राहुल गांधी मूवमेंट शुरू कर देते हैं उस उसे मुद्दे पर सरकार की हालत खराब ही हो जाती है राहुल गांधी ने किसान आंदोलन को पूरा समर्थन दिया तो सरकार को कृषि कानून वापस करना पड़ा कॉकरोच जनता पार्टी को राहुल का सपोर्ट मिला तो सरकार को शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा लेना पड़ा और अब मुख्य निर्वाचन आयुक्त के मुद्दे पर भी सरकार काफी दबाव में दिख रही है राहुल गांधी लगातार देश में मुख्य धारा की मीडिया की छाए हुये हैं और जिस सोशल मीडिया पर एक जमाने में बीजेपी ब्रिगेड ज्यादा प्रभावशाली दिखती थी उसी सोशल मीडिया पर पिछले कुछ वर्षों में राहुल गांधी का इकोसिस्टम मोदी सरकार के इको सिस्टम पर साफ तौर पर हावी होता हुआ दिख रहा है यानी “नॉरेटिव का खेल” राहुल की टीम ज्यादा बेहतर खेल रही है। जिस राहुल को एक दशक पहले पप्पू कहकर मोदी के रणनीतिकारों (सत्ता पक्ष)ने साइडलाइन करने की कोशिश की थी वही राहुल अब देश में हर रोज न्यूज़ हैडलाइन बना रहे हैं और सत्ता पक्ष का मनोबल कम होता दिख रहा है।

राहुल गांधी ने सरकार से असंतुष्ट सभी राजनीतिक और सामाजिक संगठनों को एक साथ जोड़कर सरकार चलाने वाली मोदी शाह की जोड़ी को निश्चित तौर पर थका देने वाले अनवरत राजनीतिक संघर्ष में उलझा दिया है जिसके मुद्दे भले ही बदलते जाएं लेकिन तापमान बना रहेगा।

Report – The Indian Opinion

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