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योगी जी “वक़्फ़ बोर्ड” की तरह” हिंदू संपदा बोर्ड” होता तो मठ-मंदिरों की संपत्ति सुरक्षित रहती और संतों की हत्याएं ना होती!

धार्मिक संपत्तियों के उचित प्रबंधन के अभाव और विवाद में महंत नरेंद्र गिरि की संदिग्ध मौत हो गई इसके पहले भी देश में तमाम साधु सन्यासी पुजारी धार्मिक संपत्तियों के विवाद के चलते अपनी जान गवा चुके हैं । हिंदू बाहुल्य देश भारत में भी हिंदू धर्म से जुड़ी धार्मिक संपत्तियों मंदिरों आश्रम धर्मशालाओं आदि के प्रबंधन सुरक्षा और विकास की सुनियोजित व्यवस्थाएं नहीं है जबकि इसी देश में दूसरे देशों से आए इस्लाम और ईसाई मजहब के धार्मिक संपत्तियों के प्रबंधन और विकास और संरक्षण के लिए बेहतर इंतजाम सरकारी सुविधाएं और कानूनी प्रावधान है।

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1955 में सबसे पहले अजमेर स्थित ख्वाजा की दरगाह के प्रबंधन और विकास के लिए बकायदा भारत सरकार ने कानून बनाया जिसको “दरगाह ख्वाजा साहब अधिनियम 1955” कहा जाता है इसके पश्चात 1995 में “औक़ाफ़” (इस्लाम धर्म से जुड़ी संपत्तियों) के बेहतर प्रबंधन विकास और उससे जुड़े विषयों के पर नियमन के लिए “वक़्फ़ अधिनियम 1955” लागू किया गया।

मुस्लिम वक़्फ़ अधिनियम लागू होने के बाद सरकार के द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर एक सेंट्रल वक्फ बोर्ड बनाया गया और सभी प्रदेशों में वक़्फ़ बोर्ड बनाए गए ज्यादातर प्रदेशों में शिया और सुन्नियों के संपत्तियों के प्रबंधन के लिए शिया वक्फ बोर्ड अलग और सुन्नी वक्फ बोर्ड अलग बनाया गया इन्हें बाकायदा सरकारी कार्यालय और कर्मचारी उपलब्ध कराए गए और इससे जुड़े कर्मचारियों अधिकारियों को सरकार के द्वारा वेतन और सुविधाएं भी दी जाती हैं।

अधिनियम और वक्फ बोर्ड की व्यवस्था लागू होने के बाद इस्लाम धर्म से जुड़े अधिकांश संपत्तियों को वक़्फ़ बोर्ड में रजिस्टर करवाया गया और उनके समस्त विवरण मालियत रकबा आदि वक्फ बोर्ड में दर्ज कराया गया जिससे इस्लाम धर्म से जुड़ी संपत्तियों को “खुर्द-बुर्द” ना किया जा सके बेचा ना जा सके उन्हें हमेशा के लिए सुरक्षित किया जा सके और विकसित किया जा सके।

इस व्यवस्था के लागू होने के फायदे भी हुए काफी हद तक इस्लाम धर्म से जुड़े मस्जिद मदरसे कर्बला ईदगाह खानका आदि से जुड़े आपसी विवाद बहुत कम हो गए और पदाधिकारियों के द्वारा भ्रष्टाचार किया जाना संपत्तियों को बेचा जाना लगभग असंभव हो गया।

लेकिन भारत के बहुसंख्यक हिंदू समाज के आस्था से जुड़े संपत्तियों के प्रबंधन के लिए सरकार ने अभी तक कोई व्यवस्था लागू नहीं की हिंदू धर्म के हजारों मंदिरों आश्रमों धर्मशाला गुरुकुल वेद विद्यालय आज भी बदहाल हैं और बड़े पैमाने पर उनकी संपत्ति अवैध कब्जे और लूट को खसोट की शिकार है अक्सर ऐसी खबरें आती हैं की मठ मंदिर आश्रमों के पदाधिकारी संपत्ति विवाद में उलझ जाते हैं कुछ भ्रष्ट लोग ऐसी धार्मिक संपत्तियों को बेचकर निजी लाभ के लिए उनका अस्तित्व ही समाप्त कर देते हैं ।

भारत के तमाम जनपदों में बड़े पैमाने पर मंदिरों और आश्रमों की जमीनों को वरिष्ठ पदाधिकारियों ने बेच दिया या फिर भू माफियाओं ने कब्जा कर लिया अब यदि सरकार ने वक्फ बोर्ड की तरह मुसलमानों की धार्मिक संपदा की ही भाती हिंदुओं की भी धार्मिक संपदा की सुरक्षा की व्यवस्था की होती है और “हिंदू धार्मिक संपदा बोर्ड” बनाया होता तो हिंदू धर्म से जुड़ी हुई सभी संपत्तियां हिंदू धार्मिक सम्पदा बोर्ड में पंजीकृत हो जाती उनका पूरा रिकॉर्ड सरकार के पास मौजूद होता वक़्फ़ बोर्ड की तरह ही जिले का कलेक्टर जिस तरह से वक़्फ़ का सर्वे कमिश्नर होता है और उसकी जिम्मेदारी होती है कि वक़्फ़ की संपत्तियों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए उसी तरह जिले के कलेक्टर को ही हिंदुओं की भी धार्मिक संपदा का भी कमिश्नर बनाया जा सकता है और उसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी जिला प्रशासन को दी जा सकती है।

हिंदुओं के भी मंदिर और आश्रमों की संपत्ति के बिक्री बैनामे पर प्रतिबंध होना चाहिए केवल उनके विकास से जुड़ी योजनाओं के लिए ही उनका इस्तेमाल होना चाहिए और यदि आवश्यक कार्य के लिए बिक्री करना है तो बिक्री के लिए उचित कारणों के साथ कम से कम जिला अधिकारी की अनुमति अनिवार्य होनी चाहिए तभी हिंदुओं की धार्मिक संपदा सुरक्षित रह पाएगी और इससे जुड़े विवाद हिंसक घटनाओं और साधु संतों की हत्या पर रोक लग पाएगी।

लेकिन यह चिंता की बात है कि देश की स्वतंत्रता के साथ दशक बीतने के बाद भी हिंदू समाज की धार्मिक संपदा की सुरक्षा और विकास के लिए न तो हिंदू समाज के जागरूक लोगों नेताओं और संतों के पास कोई योजना है और ना ही सरकार ने इस दिशा में कोई व्यवस्था की है।

द इंडियन ओपिनियन

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