केजीएमयू में सरकारी धन से पोषित धर्मांतरण? महिला डॉक्टर को करना पड़ा था आत्महत्या का प्रयास?एसटीएफ के खुलासे से राजभवन पर उठे सवाल!

द इंडियन ओपिनियन की ओर से जनता के दिल में उठने वाले खुले सवाल
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी, राज्यपाल आनंदीबेन पटेल जी, भाजपा के शीर्ष नेतृत्व और KGMU प्रशासन से सीधे सवाल!
अगर यही मामला अखिलेश यादव की सरकार में सामने आया होता, तो क्या भाजपा के नेता सड़कों पर उतरकर राज्यपाल और मुख्यमंत्री का इस्तीफा नहीं मांगते? क्या संसद से लेकर विधानसभा तक हंगामा नहीं करते? क्या इसे कानून-व्यवस्था और महिला सुरक्षा का सबसे बड़ा मुद्दा नहीं बना देते?
लेकिन आज उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकार है। लखनऊ के प्रतिष्ठित किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी यानी KGMU से महिलाओं के कथित शोषण, धर्मांतरण के दबाव और संस्थागत संरक्षण से जुड़े इतने गंभीर आरोप सामने आए हैं।
अब सवाल यह है कि भाजपा नेतृत्व की आवाज आखिर खामोश क्यों है?
यूपी एसटीएफ की जांच रिपोर्ट के अनुसार सामने आए मामलों पर गौर कीजिए।
पहला सवाल: मुख्य आरोपियों पर कार्रवाई का मामला
मीडिया में प्रकाशित एसटीएफ रिपोर्ट के विवरण के अनुसार:
1. डॉ. रमीजुद्दीन नायक उर्फ रमीज मलिक, पैथोलॉजी विभाग के रेजिडेंट डॉक्टर पर महिला डॉक्टरों को कथित रूप से प्रेमजाल में फंसाने, शोषण, ब्लैकमेलिंग और धर्मांतरण के लिए दबाव बनाने के गंभीर आरोप हैं। इस मामले में FIR और गिरफ्तारी की रिपोर्ट भी प्रकाशित हुई है।
2. नफीस, गांधी वार्ड के नर्सिंग स्टाफ पर महिला सहकर्मी के कथित शोषण और धर्मांतरण के बाद निकाह का आरोप है।
3. फुरकान, नर्सिंग स्टाफ पर महिला कर्मचारी को कथित रूप से संबंध में फंसाकर धर्म परिवर्तन और निकाह के लिए दबाव बनाने के आरोप हैं।
4. डॉ. आदिल पर महिला नर्सिंग कर्मचारियों को शादी का झांसा देकर कथित शोषण करने के आरोपों का उल्लेख है।
5. शफाकत अली खान, माइक्रोबायोलॉजी विभाग के संविदा कर्मचारी पर महिला कंप्यूटर ऑपरेटर ज्योति राव के साथ कथित छेड़छाड़, पीछा करने और धर्म परिवर्तन के लिए दबाव बनाने की शिकायत सामने आई।
6. रेडियोलॉजी विभाग के डॉक्टर रिजवान पर भी महिला डॉक्टरों को कथित रूप से ब्लैकमेल करने और धर्म परिवर्तन के लिए दबाव बनाने के आरोपों का मीडिया रिपोर्टों में उल्लेख है।
गवर्नर आनंदीबेन पटेल पर भी तानाशाही का आरोप धर्मांतरण मामले के बावजूद KGMU VC को दोबारा 3 साल का कार्यकाल दिया गया?
ये कोई सामान्य प्रशासनिक शिकायतें नहीं हैं। इन मामलों की निष्पक्ष जांच और प्रत्येक पीड़िता को न्याय मिलना चाहिए।
दूसरा सवाल: क्या वरिष्ठ अधिकारियों ने शिकायतों को दबाया?
सबसे गंभीर सवाल KGMU के वरिष्ठ अधिकारियों की भूमिका पर है।
एसटीएफ रिपोर्ट के हवाले से प्रकाशित खबरों में निम्नलिखित नामों की भूमिका पर सवाल उठाए गए हैं:
प्रोफेसर सुरेश बाबू, तत्कालीन विभागाध्यक्ष, पैथोलॉजी। आरोप है कि उन्होंने शिकायतों पर उचित कार्रवाई करने के बजाय आरोपी डॉक्टर का पक्ष लिया और शिकायतकर्ता महिला डॉक्टर पर मानसिक दबाव बनाया।
डॉ. सुमायरा कय्यूम, एडिशनल प्रोफेसर, पैथोलॉजी। उनकी भूमिका को लेकर भी शिकायतों के निस्तारण और आरोपी डॉक्टर को कथित संरक्षण देने के संबंध में सवाल उठाए गए हैं।
डॉ. वाहिद अली, पैथोलॉजी विभाग की बायोकेमिस्ट्री लैब से जुड़े अधिकारी। उनकी भूमिका और आरोपी डॉक्टर से कथित संबंधों की जांच की चर्चा रिपोर्ट में है।
प्रोफेसर उस्मान कौसर, मेडिसिन विभाग। उनकी भूमिका और कथित नेटवर्क से संपर्कों का उल्लेख जांच से संबंधित मीडिया रिपोर्टों में किया गया है।
डॉ. अहमद, डॉ. कलीम और डॉ. नसीम खान समेत अन्य लोगों के नाम भी रिपोर्टिंग में आए हैं। उनकी भूमिका की अलग-अलग निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।
यहां सवाल है कि अगर जूनियर महिला डॉक्टरों और कर्मचारियों की शिकायतें समय रहते गंभीरता से सुनी जातीं, तो क्या इतने सारे मामले सामने आते?
तीसरा सवाल: KGMU के कुलपति और विश्वविद्यालय प्रशासन से:
KGMU कोई निजी संस्था नहीं है। यह जनता के टैक्स के पैसे से संचालित एक प्रतिष्ठित सरकारी चिकित्सा संस्थान है।
यहां काम करने वाली महिला डॉक्टरों और कर्मचारियों की सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी थी?
शिकायतें सामने आने के बाद प्रशासन ने क्या किया?
क्या शिकायतकर्ताओं को संस्थागत सुरक्षा मिली?
क्या संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही तय हुई?
और सबसे महत्वपूर्ण सवाल:
यदि विश्वविद्यालय के प्रशासनिक नेतृत्व की कार्यप्रणाली पर इतने गंभीर सवाल उठ रहे हैं, तो कुलपति का कार्यकाल बढ़ाने के निर्णय के पीछे क्या आधार था?
क्या कार्यकाल बढ़ाने से पहले इन शिकायतों और प्रशासनिक जवाबदेही की समीक्षा की गई थी?
सरकार और विश्वविद्यालय को इसका सार्वजनिक जवाब देना चाहिए।
चौथा सवाल: राज्यपाल आनंदीबेन पटेल और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से
आनंदीबेन पटेल जी, आप उत्तर प्रदेश की राज्यपाल और KGMU की कुलाधिपति हैं।
क्या आपने इस पूरे मामले की स्वतंत्र समीक्षा कराई?
क्या आपने विश्वविद्यालय प्रशासन से जवाब मांगा?
क्या आपने यह सुनिश्चित किया कि शिकायत करने वाली महिलाओं को न्याय मिले और किसी भी अधिकारी को पद के प्रभाव से जांच प्रभावित करने का अवसर न मिले?
आपकी सरकार महिला सुरक्षा, सुशासन और जीरो टॉलरेंस की बात करती है।
तो फिर KGMU के इस मामले में हर स्तर पर जवाबदेही कब तय होगी?
केवल पत्र जारी कर देने से जिम्मेदारी पूरी नहीं होती। कार्रवाई जमीन पर दिखाई देनी चाहिए।
पांचवां सवाल: भाजपा के शीर्ष नेतृत्व से
भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी और उत्तर प्रदेश भाजपा के नेताओं से जनता के दिलों में सवाल है।
जब विपक्ष की सरकारों में महिलाओं के खिलाफ अपराध होते हैं, तब भाजपा के नेता इस्तीफे मांगते हैं, प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हैं और सड़कों पर उतरते हैं।
तो क्या महिला सुरक्षा का मुद्दा सिर्फ विपक्ष की सरकारों के लिए है?
क्या सत्ता में अपनी सरकार होने पर जवाबदेही की मांग खत्म हो जाती है?
क्या भाजपा के लिए महिला सुरक्षा और न्याय के सिद्धांत सरकार बदलने के साथ बदल जाते हैं?
यह सवाल किसी राजनीतिक दल के पक्ष या विपक्ष का नहीं, बल्कि जवाबदेही के एक समान मानक का है।
KGMU में पढ़ने और काम करने वाली बेटियां किसी की राजनीतिक मेहरबानी पर नहीं हैं। वे देश की बेटियां हैं। उन्हें सुरक्षित वातावरण देना सरकार और संस्थान की जिम्मेदारी है।
धार्मिक नफरत नहीं फैलनी चाहिए बल्कि कथित शोषण, जबरन धर्मांतरण के दबाव और संस्थागत लापरवाही के हर मामले में न्याय होना चाहिए।
क्या उत्तर प्रदेश में महिला सुरक्षा का कानून सबके लिए समान है या सत्ता के हिसाब से बदल जाता है?