अफगानिस्तान मलेशिया तक रहे भारत को पुनः संगठित करने वाले “सरदार” दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमा के अधिकारी तो हैं ही!

भारत, एक ऐसा प्राचीन राष्ट्र जिसकी राजनैतिक सांस्कृतिक सीमायें कभी सुदूर अफगानिस्तान में हिंदूकुश पर्वत व वंक्षु नदी से सिंहल द्वीप तक थीं। धन धान्य, प्राकृतिक संसाधनों से भरापूरा क्षेत्र जिसकी समृद्धि की कहानियाँ विदेशों में ‘सोने की चिड़िया’ के मिथकीय प्रतीक के रूप में दर्ज की गयीं।

भारत की राष्ट्रीयता पर और ऐसा ही घोर संकट अंग्रेजों की 200 वर्षों की गुलामी के अंत के समय आ पहुंचा।

मुस्लिमों से 800 वर्ष लंबे संघर्ष के कारण अफगानिस्तान पहले ही सांस्कृतिक रूप से भी भारत राष्ट्र की सीमाओं से निकल चुका था जबकि बर्मा 1935 में अंग्रेजों द्वारा अलग किया जा चुका था।
ऐसे समय में भारत को एक बार फिर आवश्यकता थी एक ऐसे राजमर्मज्ञ की जो भारतीय राष्ट्रीयता को राजनैतिक और भौगोलिक रूप से संगठित कर उसे ‘राष्ट्र राज्य’ का स्वरूप प्रदान करे और नियति ने भी भारतीय राष्ट्रीयता को निराश ना करते हुए एक ऐसे महापुरुष को राजनैतिक रंगमंच पर उतारा जिसने भारत के राजनैतिक एकीकरण के लक्ष्य को अपनी विलक्षण कूटनीति से इतने सहज रूप से प्राप्त कर लिया जिसके लिये महान सम्राटों को अत्यधिक रक्त बहाना पड़ा था।

भारत के इस ‘लौहपुरुष’ को पश्चिम भले ही “भारत का बिस्मार्क” कहे पर उनकी उपलब्धियों की विराटता और महानता को देखते हुये उनकी उचित उपाधि होगी,अब तक तो आप उन्हें समझ गए होंगे भारत के लौह पुरुष के नाम से जाने जाने वाले सरदार वल्लव भाई पटेल।

किसे पता था कि 31अक्टूबर 1875 में गुजरात के नाडियाड में झवेरभाई पटेल और लाडबा देवी की चौथी संतान के रूप में एक शिशु ने ही नहीं सैकड़ों वर्षों से दमित भारतीय राष्ट्रीयता को एक पूर्ण सुसंगठित राष्ट्रराज्य के रूप में एक बार फिर संगठित करने वाली नियति ने जन्म लिया है।

भारत की मिट्टी में लोटकर बड़े होते सरदार के पैर भी इस जमीन में उतनी ही गहराई से धंसते गये जिसका अपार लाभ राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन के समय कांग्रेस और उसके संघर्ष को मिला।

प्रारंभ में भले ही उनपर चढ़े अंग्रेजियत के भूत के कारण भारतीय स्वतंत्रता व राजनैतिक नेतृत्व विशेषतः गांधी के प्रति उपहासपूर्ण रहा हो परंतु समय के साथ साथ उनके व्यक्तित्व में अंतर्निहित गुण प्रकाशित होते गये और उनका चरम प्रदर्शन उन्होंने भारत के एकीकरण के के दौरान किया।

कहा जाता है कि व्यक्तित्व व्यक्ति के कर्मों व विचारों का आईना होता है और सरदार इसके अपवाद नहीं थे। सरदार मूलरूप से राजनीति के लिये ही जन्मे थे और उनके समस्त गुणों के बावजूद उनके व्यक्तित्व से राजमर्मज्ञ राजनेता की आभा ही फूटती थी। तत्कालीन समय में उनसे प्रथम भेंट करने वालों के मन में उनकी यही छवि स्थापित हो जाती थी।

‘फ्रीडम एट मिडनाइट’ के लेखक डोमनिक लापिएर और लैरी कोलिन्स ने जब माउंटबेटन के दृष्टिकोण से सरदार का मूल्यांकन किया तो उनके व्यक्तित्व का यही रूप उनके मन में बना,

“…. चट्टान जैसी हस्ती… जिसपर कोई वशीकरण काम नहीं कर सकता था….. खादी की धोती अपने कंधों पर लबादे की तरह लपेटे हुए, चमकती हुई गंजी कपाल और चढ़ी हुई त्योरियाँ वाला आदमी जो… रोमन सीनेटर प्रतीत हो रहा था।”

यहाँ यह दृष्टव्य है कि रोमन सीनेटर पश्चिम में राजनीति के प्रतीक माने जाते रहे हैं।

परंतु रोमन सीनेटरों व अन्य राजनेताओं के विपरीत उनका व्यक्तिगत जीवन निष्कलंक और सादगीपूर्ण रहा। वकालत को छोड़ने के बाद उनके पास निजी संपत्ति तो दूर रहने के लिये एक अदद घर नहीं रहा। अहमदाबाद में बाबा साहब मानवलनकर या डॉ. कानुगा के घर पर रुकते और दिल्ली में वे अग्रज विट्ठलभाई के मित्र बनवारीलालजी के औरंगजेब रोड स्थित बंगले पर रहे। स्ववरेण्य दरिद्रता का आलम यह था कि कभी पर्याप्त वस्त्र तक नहीं रहे और यह देख उनकी बेटी मणिबेन एक बार फटे कुर्ते को देखकर रो पड़ी थीं।

संगठनक्षमता में सरदार अपने युग के सभी नेताओं से कोसों आगे थे और यही कारण था कि कांग्रेस में प्रवेश करने के कुछ समयांतराल बाद ही उन्होंने काँग्रेस के संगठन पर पकड़ बना ली। 1918 में खेड़ा सत्याग्रह से शुरूआत करने वाले वल्लभ भाई पटेल ने 1928 में अपने दम पर बारडोली के सफल सत्याग्रह का संगठन और संचालन किया जिसने उन्हें बारडोली का ही नहीं सारे भारत का ‘सरदार’ बना दिया और यह शब्द उनके नाम के साथ साथ व्यक्तित्व का अभिन्न भाग बन गया।

सरदार ने क़भी कोई किताब नहीं लिखी क्योंकि उनका जीवन एक खुली किताब थी। राजनीति में होते हुए भी उन्होंने असत्य संभाषण, वचनभंग और विश्वासघात से दूर रहे। अपने स्पष्ट वक्तव्यों व निर्भीक विचारधारा के कारण उन्हें गांधीजी का मौन क्रोध झेला, लगभग हाथ आया प्रधानमंत्री पद त्यागा और यहां तक कि उन पर ‘दक्षिणपंथी’ और ‘ सांप्रदायिक’ होने के आरोप लगाये गए, मरणोपरांत भी उनकी, उनके नाम की, उनकी विरासत और उनके स्मृतिस्थलों की घोर उपेक्षा की गई, परंतु इस प्रातःस्मरणीय महापुरुष का वास्तविक यश भारत के मानचित्र में निहित है। कश्मीर से कन्याकुमारी तक और द्वारिका से कोहिमा तक संपूर्ण भारत ही सरदार पटेल का स्मारक है, उनकी विशालतम नवनिर्मित लौह प्रतिमा ‘स्टेच्यू ऑफ यूनिटी’ तो भारतवासियों के ह्रदयों में उनके स्थान को प्रतिबिंबित करने का माध्यम भर है।

आधुनिक समय में यदि हम पुनः एक राष्ट्र के रूप में खड़े हैं तो इसका श्रेय आपको जाता है सरदार। वस्तुतः हमारे ह्रदय में आपका स्थान आपकी इस लौहमूर्ति से भी ऊंचा है जिसके जरिये हम आपके प्रति अपनी कृतज्ञता प्रदर्शित करने का प्रयास कर रहे है।

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