
सावन का महीना शुरू होते ही देशभर में ‘हर हर महादेव’ के जयकारों के साथ कांवड़ यात्रा का रंग दिखाई देने लगता है। लाखों शिवभक्त कंधे पर कांवड़ लेकर गंगाजल लेने निकलते हैं और फिर उसी जल से भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर सावन में ही कांवड़ यात्रा निकालने की परंपरा क्यों शुरू हुई?

कांवड़ यात्रा की सबसे प्रचलित धार्मिक मान्यता समुद्र मंथन की कथा से जुड़ी है। मान्यता है कि समुद्र मंथन के दौरान हलाहल विष निकला था, जिसे भगवान शिव ने संसार की रक्षा के लिए अपने कंठ में धारण कर लिया। विष के प्रभाव से शिवजी का कंठ जलने लगा। तब उन्हें शीतलता देने के लिए गंगाजल अर्पित किया गया। इसी मान्यता से सावन में शिवलिंग पर जल चढ़ाने की परंपरा को जोड़ा जाता है।

वहीं, कांवड़ यात्रा की शुरुआत को लेकर भगवान परशुराम जी, रावण जी और श्रवण कुमार जी से जुड़ी अलग-अलग लोक और पौराणिक कथाएं भी प्रचलित हैं। एक मान्यता में परशुराम को पहला कांवड़िया बताया जाता है, जबकि दूसरी कथा रावण द्वारा भगवान शिव को गंगाजल अर्पित करने से इस परंपरा को जोड़ती है। हालांकि इतिहास में आधुनिक रूप वाली कांवड़ यात्रा की शुरुआत की कोई एक सर्वमान्य तारीख या व्यक्ति तय नहीं है।
आज कांवड़ यात्रा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि करोड़ों शिवभक्तों की आस्था और तपस्या का बड़ा पर्व बन चुकी है। श्रद्धालु हरिद्वार, गंगोत्री, सुल्तानगंज जैसे प्रमुख तीर्थस्थलों से गंगाजल लेकर पैदल अपने-अपने शिव मंदिरों तक पहुंचते हैं और सावन शिवरात्रि समेत निर्धारित अवसरों पर भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं। यही वजह है कि हर साल सावन में कांवड़ यात्रा देश के सबसे बड़े धार्मिक आयोजनों में शामिल हो जाती है।
ब्यूरो रिपोर्ट “द इंडियन ओपिनियन”