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क्या है यूनिफॉर्म सिविल कोड (समान नागरिक संहिता) जिसका कुछ मुस्लिम संगठन कर रहे हैं विरोध!

कानूनी जानकारों का मानना है कि संविधान के अनुच्छेद 44 के अंतर्गत भारतीय संविधान जब बनाया गया तो उस समय नीति निर्माताओं ने आने वाली सरकारों के लिए यह लक्ष्य दिया कि वह देश के निकट भविष्य में सभी जाति धर्म के लोगों के लिए समान कानून यानी समान नागरिक संहिता (निष्पक्ष कानून) को लागू करेंगे।
कई बार देश की न्यायपालिका ने भी कहा है कि देश के सभी नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता यानी एक जैसे नियम कानून होनी चाहिए नागरिक किसी भी जाति धर्म के उनके लिए कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए।

लेकिन भारत में अलग-अलग धर्मों के लिए अलग-अलग कानून लागू है सबसे पहले अंग्रेजी शासन में हिंदू और मुसलमानों को विभाजित करने के लिए इस प्रकार का कानून लागू किया गया था जो आज तक लगभग उसी प्रकार से लागू है । लोग इसे राजनीति और डिवाइड एंड रूल या तुष्टीकरण की भावना से भी देखते हैं भारत में मुस्लिम ईसाई पारसी भाइयों के लिए अलग कानून है जिसे पर्सनल लॉ भी कहते हैं वही हिंदू बौद्ध जैन के लिए अलग है जो कि हिंदू सिविल लॉ के अंतर्गत है । यह कानून शादी विवाह तलाक तलाकशुदा महिलाओं को गुजारा भत्ता भरण पोषण और संपत्ति के विषयों पर लागू होते हैं जिसका व्यापक सामाजिक प्रभाव भी होता है। इन भेदभाव पूर्ण कानूनों की वजह से मुस्लिम महिलाओं के कानूनी अधिकार हिंदू महिलाओं की तुलना में काफी कम माने जाते हैं।

मसलन हिंदुओं के लिए तलाक लेना और दूसरी शादी करना बहुत ही मुश्किल काम है वही मुसलमानों के लिए हिंदुओं की तुलना में यह बहुत आसान माना जाता है क्योंकि इस्लाम के मानने वालों के लिए भारत में अलग कानूनी सुविधाएं दी गई हैं इसीलिए आपने देखा होगा कि कई मुसलमानों की एक से अधिक पत्नियां और बड़ी संख्या में बच्चे भी होते हैं भारत में लोग इसे मुस्लिम जनसंख्या में तेजी से वृद्धि का भी एक कारण मानते हैं। इसके लिए अलावा मुसलमानों के द्वारा अपनी बीवियों को तलाक देना और तलाक देकर दूसरी शादी कर लेना बहुत आसान माना जाता है। वही दूसरी तरफ हिंदू बौद्ध जैन सिख के लिए अलग कानूनी प्रावधान है इसी विषय पर कई दशकों से भारतीय जनता पार्टी समान नागरिक संहिता लागू करने की मांग करती आ रही है।

जनसंघ और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नेताओं का मानना था कि एक देश के नागरिकों के लिए कानून होने चाहिए भले ही वह किसी भी धर्म के हो । लेकिन कुछ मुस्लिम संगठन इस कानून का विरोध करते हैं वह मानते हैं कि यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू होने से इस्लामिक शरिया के मुताबिक धार्मिक स्वतंत्रता कम हो सकती है तलाक और दूसरी तीसरी शादी करने में कानूनी दिक्कतें आ सकती हैं। हालांकि कुछ प्रगतिशील मुस्लिम संगठन और मुस्लिम महिलाओं के संगठन समान नागरिक संहिता का समर्थन करते हैं उनके मुताबिक इससे मुस्लिम समाज प्रगतिशील और आधुनिक बनेगा और महिलाओं की स्थिति में सुधार होगा।

दुनिया के कई बड़े मुस्लिम देशों ने अपने यहां विशेष इस्लामिक कानूनों की बजाय समान नागरिक संहिता को लागू किया है पाकिस्तान बांग्लादेश और इंडोनेशिया जैसे अनेक बड़े मुस्लिम देशों में भी समान नागरिक संहिता लागू है सभी धर्मों के लिए निष्पक्ष कानून का पालन किया जाता है ।

2014 के बाद से देश की सत्ता चलाने वाली भारतीय जनता पार्टी ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में भी समान नागरिक संहिता लागू करने का वादा किया था हालांकि अभी तक भाजपा वादा पूरा नहीं कर पाई है जिसके लिए भाजपा के समर्थक उनकी आलोचना भी कर रहे हैं ।

हाल ही में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा है कि समान नागरिक संहिता लागू करवाएंगे उत्तर प्रदेश के डिप्टी सीएम केशव मौर्य ने भी कहा है कि अब राम मंदिर बन गया है और अब समान नागरिक संहिता लागू करने का समय आ गया है ।

हमारे देश में मजहबी राजनीति करने वाले दल और सांप्रदायिकता की रोटी सेकने वाले नेता अभी भी अपने फायदे और सत्ता हासिल करने के लिए देशहित के खिलाफ बातें करने में संकोच नहीं करते इसलिए समान नागरिक संहिता को लेकर भी विवाद की स्थिति बनी हुई है ।

देखने वाली बात होगी कि से 8 सालों से केंद्र की सरकार चला रही भारतीय जनता पार्टी यूनिफॉर्म सिविल कोड और जनसंख्या नियंत्रण कानूनों को लागू करने का साहस कब तक दिखा पाती है।

द इंडियन ओपिनियन
लखनऊ

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