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पैरेंट्स की ये गलतियां बच्‍चे को बना रही हैं डरपोक ( Coward ), 90 पर्सेंट लोग कर रहे हैं ऐसी हरकतें

बेशक, हम सभी अपने बच्चों की सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध होते हैं। लेकिन ओवरप्रोटेक्शन हमारे बच्चे की क्षमता में बाधा डालता है। ओवरप्रोटेक्ट का मतलब है जरूरत से ज्यादा सुरक्षा। लेकिन कभी-कभी आपका प्यार या चिंता बच्चे के लिए परेशानी का सबब बन जाता है। बच्चे को लेकर प्रोटेक्टिव होना लाजमी है, लेकिन आपकी यह चिंता कब ओवर-प्रोटेक्टिवनेस में बदल जाती है, इसका आपको खुद भी पता नहीं चलता। ओवरप्रोटेक्टिव पैरेंट्स के बच्चों को अपने आगे के जीवन में बहुत सी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है।

समस्याएं तब शुरू होती हैं, जब बड़े होने पर उन्हें खुद जिम्मेदारियां उठानी पड़ती हैं। बच्‍चों को प्‍यार करने में कोई बुराई नहीं है, लेकिन कोई भी चीज हद से ज्‍यादा हो तो फायदे की जगह नुकसान ही पहुंचाती है। 2016 में फ्लोरिडा स्टेट यूनिवर्सिटी द्वारा किए गए एक रिसर्च के अनुसार, ओवरप्रोटेक्टिव पैरेंट्स के बच्चों को बड़े होकर बहुत सी बीमारियों का सामना करना पड़ता है। इस आर्टिकल में हम आपको ओवरप्रोटेक्टिव पैरेंट्स के लक्षणों और बच्चों के व्यक्तित्व पर असर डालने वाले कुछ निगेटिव प्रभावों के बारे में बता रहे हैं, जो आपको इसके बारे में जागरूक करने के अलावा इन विशेषताओं को पहचानने में आपकी मदद कर सकते हैं।

बच्‍चे को जिम्‍मेदार बनाएं

जो पैरेंट्स सोचते हैं कि उनके बच्‍चे चुनौतियों का सामना करने और जिम्‍मेदारी उठाने के लिए अभी नासमढ हैं, वो ही पैरेंट्स बच्‍चे के गलती करने पर उसे जज करते हैं। अपने बच्‍चे को गलती करने और गिर कर उठना सीखने के लिए खुला आसमान दें। उसे बाहर की दुनिया को समझने का मौका दें। घर के छोटे-मोटे काम करने से ही बच्‍चे का आत्‍मविश्‍वास बढ़ेगा। आप उसे कॉन्फिडेंट बनाएं ना कि डरपोक।

 

​ओवरप्रोटेक्टिव पैरेंट्स के लक्षण

आपके बच्चे द्वारा किए जानेवाले सभी कामों का सूक्ष्म प्रबंधन यानी माइक्रो मैनेजिंग करना।

  • अपने बच्चों को असफलता से बचाना।
  • अपने बच्चे को जिम्मेदारी नहीं सिखाना।
  • अपने बच्चे को बहुत ज्यादा दिलासा देना।
  • अपने बच्चे के दोस्तों पर नजर रखना।
  • लगातार उन्हें खतरे के प्रति आगाह करना।
  • उनकी पसंद की एक्टिविटी को कंट्रोल करना।
  • उन पर लगातार नजर रखना |

​इस तरह की बातें ना करें.

बच्‍चे से इस तरह की बातें ना कहें ‘हम गरीब हैं इसलिए इसे अफोर्ड नहीं कर सकते हैं’ या ‘परिवार की समस्‍याओं की वजह से दूसरे पैरेंट्स की तरह इंजॉय नहीं कर सकते हैं’। इससे बच्‍चे के दिमाग में विक्टिम मानसिकता बनने लगती है और वो नए अवसरों के लिए बहाने ढूंढने लग सकता है। उसे लगने लगेगा कि उसके पास चीजों का अभाव है या वो दूसरों की तरह भाग्‍यशाली नहीं है।

 

 

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