खेती में मशीनें बढ़ीं, रोजगार कहाँ गया?
कभी अर्थशास्त्र हमें श्रम-प्रधान और पूंजी-प्रधान तकनीक के बीच संतुलन सिखाता था। आज सवाल यह है कि भारत जैसे विशाल श्रमबल वाले देश ने इस संतुलन को कितना याद रखा है?

हमारे बचपन की अर्थशास्त्र की किताबों में श्रम-प्रधान तकनीक और पूंजी-प्रधान तकनीक की खूब चर्चा होती थी। तब यह समझाया जाता था कि भारत जैसे अधिक जनसंख्या और सीमित पूंजी वाले देश में ऐसी तकनीक अपनानी चाहिए जो उत्पादन भी बढ़ाए और रोजगार भी पैदा करे। आज तकनीक बहुत आगे निकल चुकी है,और खेती इसका सबसे जीता जागता उदाहरण है।

ट्रैक्टर ने जुताई का समय घटाया, बीज बोने की मशीनों ने श्रम घटाया और कंबाइन हार्वेस्टर ने कटाई-मड़ाई का काम लगभग एक साथ कर दिया। इसमें कोई संदेह नहीं कि इससे कृषि अधिक तेज और उत्पादक हुई है। लेकिन इसके साथ एक दूसरा सवाल भी खड़ा हुआ है कि जो हाथ पहले खेत में काम करते थे, वे अब क्या कर रहे हैं?
यही भारत की प्रच्छन्न बेरोजगारी की बड़ी चुनौती है। खेत में कई लोग काम करते दिखाई देते हैं, लेकिन यदि उनमें से कुछ लोगों को हटा दिया जाए और उत्पादन लगभग उतना ही रहे, तो उनका रोजगार वास्तव में उत्पादक रोजगार नहीं है। नीति आयोग के विश्लेषण में भी कृषि में ऐसी श्रम-अधिकता और कम उत्पादकता की समस्या को रेखांकित किया गया है।

इसका अर्थ यह नहीं कि हम मशीनों को रोक दें। समस्या मशीन नहीं है, समस्या यह है कि मशीन से मुक्त होने वाले श्रम के लिए अगला रोजगार हमने पर्याप्त तेजी से नहीं बनाया। ग्रामीण क्षेत्रों में खाद्य प्रसंस्करण, भंडारण, परिवहन, मरम्मत, छोटे उद्योग, निर्माण, ग्रामीण सेवाओं और कृषि-आधारित उद्यमों का बड़ा विस्तार किया जा सकता है। नीति आयोग भी कृषि से बाहर रोजगार के विविधीकरण और कृषि-मूल्य श्रृंखला में रोजगार बढ़ाने की आवश्यकता पर जोर देता रहा है।
भारत को न केवल अधिक उत्पादन वाली तकनीक चाहिए, बल्कि अधिक उत्पादक रोजगार वाली अर्थव्यवस्था भी चाहिए। मशीनें खेत में रहें, लेकिन इंसान बेरोजगार न हो। आखिर विकास का उद्देश्य केवल कम लोगों से ज्यादा उत्पादन करना है,या ज्यादा लोगों को बेहतर और सम्मानजनक जीवन यापन कार्यों से जोड़ना भी है?
आलेख-विकास चन्द्र अग्रवाल