काठमांडू/बीजिंग।
नेपाल-चीन सीमा पर आई भीषण बाढ़ अब केवल प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि कूटनीतिक विवाद का विषय भी बन गई है। नेपाल की ओर से आरोप लगाया गया कि चीन की तरफ बने भू-अवरोध (जियोलॉजिकल डैम) और समय पर सूचना न मिलने के कारण तबाही कई गुना बढ़ गई। वहीं चीन ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि “आरोप लगाने से कुछ हासिल नहीं होगा, वैज्ञानिक तथ्यों और राहत कार्यों पर ध्यान देना चाहिए।”

नेपाल का आरोप क्या है?
नेपाली अधिकारियों का कहना है कि सीमा के चीनी हिस्से में हुई भू-वैज्ञानिक घटना और संभावित जल-अवरोध की जानकारी समय रहते साझा नहीं की गई। उनका दावा है कि यदि समय पर चेतावनी मिलती, तो सीमावर्ती इलाकों से लोगों को सुरक्षित निकाला जा सकता था और जान-माल का नुकसान कम होता।

चीन ने क्या जवाब दिया?
चीन ने नेपाल के आरोपों को सिरे से नकारते हुए कहा कि बिना वैज्ञानिक जांच के किसी पर दोषारोपण करना उचित नहीं है। चीन का कहना है कि प्राथमिक जांच के अनुसार यह घटना हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियर और चट्टानों के बड़े धंसाव तथा भूकंपीय गतिविधि से जुड़ी प्राकृतिक आपदा थी।

तबाही कितनी बड़ी? (मुख्य आंकड़े)
मृतकों की संख्या: 160 से अधिक
लापता लोग: 400 से अधिक, जिनमें बड़ी संख्या विदेशी नागरिकों की भी है।
कई गांव, पुल, सड़कें और जलविद्युत परियोजनाएं पूरी तरह तबाह।
हजारों राहतकर्मी, हेलीकॉप्टर और ड्रोन राहत एवं बचाव कार्य में जुटे हैं।
भारत सहित कई देशों और संयुक्त राष्ट्र ने राहत सहायता भेजी है।

वैज्ञानिक क्या बता रहे हैं?
विशेषज्ञों के अनुसार यह बाढ़ हिमालय में ग्लेशियर के बड़े हिस्से के टूटने, चट्टानों के धंसने और मलबे के तेज बहाव से उत्पन्न हुई। शुरुआती आशंका भूकंप की थी, लेकिन बाद की जांच में ग्लेशियर ध्वंस और मलबे के प्रवाह को प्रमुख कारण माना गया।
भारत पर भी असर
नेपाल-चीन सीमा पर आई इस आपदा के बाद बिहार समेत निचले इलाकों में भी सतर्कता बढ़ाई गई। प्रशासन ने नदी किनारे रहने वाले लोगों को सावधान रहने और संभावित बाढ़ के खतरे को देखते हुए निगरानी बढ़ाने के निर्देश दिए हैं।