कच्चा तेल 109 डॉलर, पेट्रोल अभी स्थिर लेकिन यह राहत कब तक?
_तेल महंगा, रुपया कमजोर और कंपनियां घाटे में ऐसे में सवाल है, इस झटके की कीमत आखिर कौन चुकाएगा?_
नई दिल्ली। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत एक बार फिर भारत के लिए चिंता का संकेत बन गई है। Brent crude करीब 109 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच चुका है और इस सप्ताह इसकी कीमत में लगभग 13 प्रतिशत की तेजी आई है। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में आपूर्ति बाधित होने की आशंका इसके पीछे बड़ी वजह है।

भारत के लिए समस्या सिर्फ महंगा तेल नहीं है। तेल डॉलर में खरीदा जाता है और *रुपया भी करीब ₹95.6 प्रति डॉलर* तक कमजोर हो चुका है। यानी भारत को एक ही समय में महंगा कच्चा तेल और महंगा डॉलर,दोनों का ही सामना करना पड़ रहा है। भारत अपने कच्चे तेल की जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए इसका सीधा असर देश के आयात बिल , चालू खाते और महंगाई पर पड़ सकता है।
फिलहाल उपभोक्ता को कुछ राहत जरूर है। पेट्रोल-डीजल के खुदरा दाम तत्काल बढ़ाए जाने के संकेत नहीं हैं। लेकिन इस राहत की दूसरी तस्वीर भी है । रिपोर्टों के अनुसार तेल कंपनियों को पेट्रोल पर लगभग ₹5 और डीज़ल पर ₹23 प्रति लीटर के नेगेटिव मार्केटिंग मार्ज़िन का सामना करना पड़ रहा है। एल पी जी पर भी कम वसूली का दबाव है।
यहीं से असली सवाल शुरू होता है। अगर कच्चा तेल लंबे समय तक 100 डॉलर से ऊपर रहता है, तो यह बोझ आखिर कौन उठाएगा? सरकार, तेल कंपनियां या अंततः उपभोक्ता? और अगर पेट्रोल-डीजल के दाम नहीं बढ़ते, तो क्या इसकी कीमत तेल कंपनियों के वित्तीय स्वास्थ्य, सरकारी खजाने या दूसरी वस्तुओं की महंगाई के रास्ते आम आदमी तक पहुंचेगी?

आज पेट्रोल पंप पर कीमत स्थिर है, इसलिए खतरा दिखाई नहीं दे रहा। लेकिन अर्थव्यवस्था में महंगे तेल का असर पेट्रोल पंप से बहुत पहले शुरू हो जाता है। परिवहन, माल ढुलाई, उत्पादन और रोजमर्रा की वस्तुओं की लागत पर इसका दबाव धीरे-धीरे सामने आता है।
सवाल सिर्फ यह नहीं कि पेट्रोल कब महंगा होगा। सवाल यह है कि ₹109 का तेल और ₹95 का डॉलर,इन दोनों की कीमत आखिर देश कब और किस रूप में चुकाएगा?
इस मुद्दे पर आप भारत सरकार को क्या सुझाव देना चाहेंगे?