सत्य निकेतन के बाद 58 इमारतें ध्वस्त, 1,252 PG की जांच लेकिन सवाल है, यह सब पहले क्यों नहीं हुआ?
नई दिल्ली। सत्य निकेतन में सात लोगों की जान लेने वाले भवन हादसे के बाद दिल्ली में अचानक कार्रवाई तेज हो गई है। MCD ने 12 जोनों में अवैध और खतरनाक निर्माणों के खिलाफ अभियान शुरू किया है। अब तक 58 इमारतें गिराई जा चुकी हैं और 31 अन्य के खिलाफ कार्रवाई के आदेश दिए गए हैं। एक सर्वे में 1,252 PG इमारतों की जांच हो चुकी है, जिनमें तीन को खतरनाक और नौ को बड़े मरम्मत कार्य की जरूरत वाला पाया गया है।

लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर इतनी बड़ी संख्या में इमारतें असुरक्षित थीं, तो प्रशासन को इसका पता सात मौतों के बाद ही क्यों चला? सत्य निकेतन की इमारत को लेकर अवैध निर्माण के सवाल सामने आ रहे हैं और हादसे के बाद आसपास की इमारतों को भी खाली कराया गया। सुप्रीम कोर्ट में भी छात्र आवासों, PG और निजी हॉस्टलों की समयबद्ध सुरक्षा जांच का मुद्दा पहुंच चुका है।
यह केवल एक मकान मालिक की गलती का मामला नहीं है। एक अवैध निर्माण एक दिन में पांच मंजिल का नहीं हो जाता। नक्शा, निर्माण, निरीक्षण, बिजली-पानी के कनेक्शन, व्यावसायिक इस्तेमाल और वर्षों तक वहां छात्रों का रहना,इन सबके बीच कहीं न कहीं सरकारी निगरानी की जिम्मेदारी भी आती है। दिल्ली हाई कोर्ट ने भी सवाल उठाया है कि ऐसी घटनाओं में जिम्मेदारी केवल PG मालिक की नहीं, बल्कि नियामक संस्थाओं की भूमिका की भी जांच होनी चाहिए।
हादसे के बाद बुलडोजर चलाना जरूरी है, लेकिन बुलडोजर रोकथाम की व्यवस्था का विकल्प नहीं हो सकता। हर PG और छात्रावास का डिजिटल रजिस्ट्रेशन, संरचनात्मक सुरक्षा प्रमाणपत्र, अग्नि सुरक्षा जांच और नियमित निरीक्षण होना चाहिए। और सबसे महत्वपूर्ण ,जिस अधिकारी के क्षेत्र में वर्षों तक अवैध या खतरनाक निर्माण चलता रहा, वहां केवल इमारत नहीं, जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए।
*सवाल यह नहीं कि हादसे के बाद कितनी इमारतें गिराई गईं। सवाल यह है कि हादसे से पहले कितनी जिंदगियां बचाई गईं?*
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