Supreme Court का Abu Salem पर बड़ा फैसला: जेल की सजा की गणना को लेकर क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट ने गैंगस्टर अबू सलेम की समय से पहले रिहाई की मांग वाली याचिका खारिज कर दी है। अदालत ने सजा की गणना को लेकर अहम बात कही कि दो मामलों में सजा अगर concurrent यानी एक साथ चल रही है, तो जेल में बिताए गए एक ही समय को दो बार नहीं गिना जा सकता।
सलेम ने दावा किया था कि अंडरट्रायल के रूप में बिताई गई अवधि, सजा के बाद की जेल अवधि और earned remission को जोड़ने पर वह 25 साल की अधिकतम अवधि पूरी कर चुका है। सुप्रीम कोर्ट ने इस गणना को स्वीकार नहीं किया।
क्या था पूरा मामला?
अबू सलेम को Portugal से भारत लाने के दौरान भारत सरकार ने वहां की सरकार को यह sovereign assurance दिया था कि उसे मौत की सजा नहीं दी जाएगी और 25 साल से ज्यादा की imprisonment नहीं होगी।
बाद में सलेम को अलग-अलग मामलों में life imprisonment की सजा मिली। 2015 में TADA Case और 2017 में एक अन्य मामले में मिली सजा को concurrent चलाने का आदेश दिया गया था।
सलेम का कहना था कि उसकी जेल में बिताई गई पूरी अवधि को 25 साल की सीमा में शामिल किया जाए और उसे अब रिहा किया जाए।
Supreme Court ने Double Counting पर क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट के सामने सलेम की calculation में एक अहम समस्या थी।
उसने एक तरफ अंडरट्रायल custody की गणना 2017 की दूसरी conviction तक की और दूसरी तरफ post-conviction custody की गणना 2015 की पहली conviction से शुरू की।
इससे 25 फरवरी 2015 से 7 सितंबर 2017 के बीच का वही समय दो बार count हो रहा था।
कोर्ट ने कहा कि concurrent sentences एक साथ चलती हैं। इसलिए एक ही physical incarceration period को दो अलग-अलग sentences के लिए दो बार नहीं गिना जा सकता।
आसान भाषा में समझें
अगर किसी व्यक्ति की दो सजा एक साथ चल रही हैं और वह उसी दौरान जेल में है, तो:
एक ही जेल अवधि = एक ही अवधि की गणना
उसे दो अलग-अलग सजा के नाम पर दो बार जोड़कर कुल जेल अवधि artificially बढ़ाई नहीं जा सकती।
क्या Jail Remission भी 25 साल में जोड़ सकते हैं?
सलेम ने जेल में अच्छे आचरण के आधार पर मिली earned remission का भी हवाला दिया था।
लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसे भी 25 साल की अवधि को और कम करने के लिए जोड़ने से इनकार कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि सलेम की मूल judicial sentence अभी भी life imprisonment है।
25 साल की सीमा उसकी life sentence को 25 साल की fixed-term sentence में बदलने का काम नहीं करती। यह सीमा भारत सरकार द्वारा Portugal को दिए गए sovereign assurance से जुड़ी है।
25 साल की सीमा क्यों महत्वपूर्ण है?
यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अबू सलेम को Portugal से extradite करने के लिए भारत सरकार ने assurance दिया था कि उसे 25 साल से अधिक imprisonment नहीं दी जाएगी।
सुप्रीम कोर्ट ने 2022 में उसकी sentence की calculation के लिए 12 October 2005 को starting date माना था। 2026 के ताजा फैसले में भी कोर्ट ने इसी आधार पर calculation करने की बात दोहराई।
लेकिन अदालत ने साफ किया कि इस assurance का मतलब यह नहीं है कि सलेम अपनी सुविधा के अनुसार अलग-अलग custody periods को जोड़कर 25 साल की अवधि जल्दी पूरी दिखा सकता है।
Supreme Court का बड़ा Legal Principle
इस फैसले से एक महत्वपूर्ण principle सामने आया है:
Concurrent sentences का मतलब यह नहीं है कि एक ही जेल अवधि को multiple times count किया जा सकता है।
साथ ही, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि Executive द्वारा दिया गया extradition assurance और अदालत द्वारा दी गई judicial sentence दो अलग कानूनी चीजें हैं।
अबू सलेम की conviction life imprisonment ही बनी हुई है। 25 साल की सीमा extradition assurance से आती है, न कि अदालत द्वारा life sentence को 25 साल की fixed sentence में बदलने से।
क्या अबू सलेम तुरंत रिहा होगा?
नहीं।
सुप्रीम कोर्ट ने Bombay High Court के उस फैसले को बरकरार रखा जिसमें सलेम की तत्काल रिहाई की मांग को खारिज किया गया था। Supreme Court ने उसकी appeal भी dismiss कर दी।
इसका मतलब यह है कि केवल undertrial custody, concurrent sentences और remission को जोड़कर यह दावा नहीं किया जा सकता कि 25 साल की अवधि पूरी हो चुकी है।
निष्कर्ष
अबू सलेम मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला सिर्फ उसकी रिहाई से जुड़ा मामला नहीं है, बल्कि सजा की कानूनी गणना को लेकर भी महत्वपूर्ण है।
कोर्ट ने साफ किया कि concurrent sentences में एक ही अवधि को दो बार count नहीं किया जा सकता और jail-earned remission को इस तरह जोड़कर extradition assurance की 25 साल की सीमा को artificial तरीके से कम नहीं किया जा सकता।
यानी सजा की गणना कानून के तय तरीके से होगी, calculation में double benefit नहीं मिलेगा।