दिल्ली-एनसीआर में बच्चों को प्रदूषित हवा से बचाने के लिए खेल रोकने की सलाह।क्या यह समाधान है या हमारी असफलता का संकेत?

हर साल नवंबर और दिसंबर आते ही दिल्ली-एनसीआर की हवा खराब होने लगती है। इस बार स्थिति यहां तक पहुंच गई है कि वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग ने दिल्ली, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और राजस्थान को इन दो महीनों में विद्यालयों की बाहरी खेल प्रतियोगिताएं आयोजित न करने की सलाह दी है। पहले से तय प्रतियोगिताओं को दूसरी तारीख में कराने की बात कही गई है।

बच्चों को प्रदूषित हवा में दौड़ने और खेलने से बचाना निश्चित रूप से जरूरी है। लेकिन क्या हमें इस फैसले को केवल बच्चों की सुरक्षा के रूप में देखना चाहिए? जिस हवा में बच्चों को खेलना रोकना पड़े, उस शहर की हवा को साफ रखने की जिम्मेदारी किसकी है? क्या खेल के मैदानों को बंद करना समाधान है या यह उस समस्या की गंभीरता का प्रमाण है जिसे हम वर्षों से स्थायी रूप से हल नहीं कर पाए?

दिल्ली-एनसीआर की समस्या केवल दिल्ली की नहीं है। आधिकारिक विशेषज्ञ अध्ययन में पाया गया है कि सर्दियों में सूक्ष्म कणों का प्रदूषण परिवहन, उद्योग, बिजली संयंत्र और जैविक ईंधन के जलने जैसे अनेक स्रोतों से आता है तथा प्रदूषण आसपास के क्षेत्रों से भी एक-दूसरे में पहुंचता है। हवा के बहाव की कोई निर्धारित सीमा , कोई तय दिशा नहीं होती, फिर प्रदूषण से लड़ने की जिम्मेदारी केवल एक शहर की कैसे हो सकती है?
हम बच्चों को स्वस्थ रहने के लिए खेल खेलने की सलाह देते हैं, लेकिन अब उसी बच्चे से कह रहे हैं कि सर्दियों के दो महीने बाहर मत खेलो। यह केवल वायु प्रदूषण की समस्या नहीं, हमारी विकास व्यवस्था के सामने खड़ा एक आईना है। सड़कें बढ़ीं, वाहन बढ़े, निर्माण बढ़ा और शहरों का विस्तार हुआ लेकिन क्या स्वच्छ हवा के लिए हमारी तैयारी भी उसी गति से बढ़ी?
बच्चों को मैदान से दूर करना शायद तत्काल सुरक्षा दे सकता है, लेकिन स्थायी समाधान नहीं। असली सफलता उस दिन होगी जब नवंबर-दिसंबर में खेल रोकने की जरूरत ही न पड़े।
रिपोर्ट-विकास चन्द्र अग्रवाल