बाई से बुकिंग तक – घरेलू काम की बदलती दुनिया

गुरुग्राम में इन दिनों घर से बाहर निकलते हुए एक दृश्य अक्सर दिखाई देता है। अलग-अलग रंगों की वर्दी पहने महिलाएँ और युवतियाँ हाथ में मोबाइल लिए किसी सोसायटी की ओर जाती हुई दिखाई देती हैं। किसी की वर्दी हरे रंग की है, किसी की बैंगनी और किसी की गुलाबी। पहली नजर में वे सामान्य घरेलू सहायिकाएँ ही लगती हैं, लेकिन उनकी वर्दी पर लिखे नाम बताते हैं कि घरेलू काम की दुनिया में एक नया अध्याय शुरू हो चुका है।
कुछ समय पहले तक किसी घर में अचानक काम करने वाली महिला की जरूरत पड़ जाए तो पहला सहारा पड़ोस, परिचितों या पहले से काम करने वाली “बाई” का विकल्प ही होता था। लेकिन अब मोबाइल पर कुछ क्लिक करके एक या दो घंटे के लिए घरेलू सहायता बुक की जा सकती है। आवश्यकता समाप्त हुई और सेवा भी समाप्त। न महीने भर की प्रतिबद्धता, न रोज आने की बाध्यता और न ही इस बात की चिंता कि आज काम करने वाली आएगी या नहीं।
मेरे अपने घर में भी एक अवसर पर ऐसी सेवा लेने का अनुभव हुआ। लगभग एक घंटे के लिए एक महिला आई, घर की आवश्यक सफाई और पोछा किया और काम पूरा होने के बाद चली गई। आवश्यकता दोबारा हुई तो उसे फिर बुलाया जा सकता था। अनुभव छोटा था, लेकिन उसने एक बड़े बदलाव की ओर ध्यान जरूर खींचा कि घरेलू काम अब धीरे-धीरे व्यक्तिगत व्यवस्था से निकलकर एक संगठित सेवा का रूप ले रहा है।
इस उभरते हुए क्षेत्र में Pronto, Urban Company और Snabbit जैसी कंपनियाँ सक्रिय हैं। इनके काम करने के तरीकों और सेवाओं में अंतर हो सकता है, लेकिन इनके पीछे दिखाई देने वाला मूल विचार एक है ,घरेलू श्रम को तकनीक के माध्यम से व्यवस्थित करना, ग्राहक की आवश्यकता के अनुसार उपलब्ध कराना और काम के लिए समय के आधार पर भुगतान की व्यवस्था विकसित करना। इन कंपनियों की अपनी वेबसाइटों पर उपलब्ध जानकारी इस क्षेत्र के तेजी से विस्तार की ओर संकेत करती है। यह अभी मुख्यतः महानगरों और बड़े शहरों में दिखाई देने वाला परिवर्तन है, इसलिए इसे पूरे देश की घरेलू कामगार व्यवस्था में आ चुका बदलाव मानना जल्दबाजी होगी।

लेकिन इस कहानी का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष शायद ग्राहक नहीं, काम करने वाला व्यक्ति है।
परंपरागत घरेलू काम में एक महिला प्रायः कुछ निश्चित घरों में काम करती है। उसका समय, आय और काम का स्वरूप उन घरों के साथ बने व्यक्तिगत संबंध पर निर्भर करता है। नई व्यवस्था में उसके सामने एक अलग विकल्प खुल रहा है अब वह अपने श्रम को किसी एक परिवार तक सीमित रखने के बजाय एक ऐसे मंच के माध्यम से अलग-अलग ग्राहकों तक पहुँचा सकती है, जहाँ काम समय और आवश्यकता के अनुसार मिलता है। इसका अर्थ यह नहीं कि यह व्यवस्था हर कामगार के लिए अनिवार्य रूप से बेहतर है; लेकिन इतना जरूर है कि रोजगार के विकल्पों का दायरा बढ़ रहा है।
यही कारण है कि इस बदलाव को केवल सुविधा की दृष्टि से देखना अधूरा होगा। यह उस लंबे समय से असंगठित रहे क्षेत्र को अधिक औपचारिक बनाने की दिशा में एक प्रयोग भी है। ग्राहक को समय की सुविधा मिलती है, कामगार को अतिरिक्त काम पाने का अवसर और कंपनियों को एक नया सेवा-बाजार। तीनों के बीच बन रहा यह नया संबंध आने वाले वर्षों में घरेलू श्रम की पारंपरिक व्यवस्था को प्रभावित कर सकता है।
इसका असर उन परिवारों पर भी पड़ना स्वाभाविक है जो वर्षों से पूर्णकालिक या नियमित घरेलू सहायिकाओं पर निर्भर रहे हैं। यदि किसी परिवार को केवल दो घंटे सफाई, बर्तन या दूसरे घरेलू काम के लिए सहायता चाहिए, तो अब उसके पास स्थायी घरेलू सहायिका रखने के अतिरिक्त एक विकल्प उपलब्ध है। दूसरी ओर, यदि काम करने वाली महिला को अपनी सुविधा के अनुसार अलग-अलग समय में काम मिल सकता है, तो उसके लिए भी पारंपरिक व्यवस्था के बाहर आय का एक रास्ता बनता है।
हालाँकि इस नई व्यवस्था को लेकर कई प्रश्न अभी खुले हुए हैं। कामगार की वास्तविक शुद्ध आय कितनी है? आने-जाने में लगने वाला समय और खर्च कितना है? बीमारी या काम न मिलने की स्थिति में उसकी आय का क्या होता है? प्लेटफॉर्म पर निर्भरता बढ़ने के बाद उसके पास कितनी स्वतंत्रता वास्तव में बचती है? और सबसे महत्वपूर्ण कि क्या यह मॉडल लंबे समय में कामगार को केवल अधिक काम देता है या अधिक आर्थिक सुरक्षा भी देता है?

इन प्रश्नों के उत्तर समय के साथ ही मिलेंगे। अभी यह क्षेत्र तेजी से विकसित हो रहा है और अलग-अलग कंपनियाँ अपने-अपने मॉडल के साथ प्रयोग कर रही हैं। इसलिए किसी एक कंपनी के दावे को पूरे क्षेत्र की तस्वीर मानना उचित नहीं होगा।
फिर भी बदलाव को नजरअंदाज करना कठिन है। जिस घरेलू श्रम की व्यवस्था कभी पूरी तरह व्यक्तिगत संबंधों, स्थानीय परिचय और भरोसे पर टिकी थी, उसमें अब तकनीक, डिजिटल भुगतान, समय-आधारित मूल्य, ग्राहक प्रतिक्रिया और संगठित मंच प्रवेश कर चुके हैं।
शायद आने वाले समय में हम यह कम पूछेंगे कि “आपके घर में कौन-सी बाई आती है?” बल्कि शायद यह ज़्यादा पूछेंगे कि आपको घरेलू मदद कितने घंटे के लिए चाहिए?”
टैक्सी से लेकर भोजन, किराने और दूसरी सेवाओं तक जिस डिजिटल अर्थव्यवस्था ने हमारे रोजमर्रा के जीवन को बदला है, अब उसकी दस्तक घर के भीतर भी सुनाई दे रही है।
“ बाई से बुकिंग तक ” का यह सफर केवल सुविधा की कहानी नहीं है। यह हमारे शहरों में श्रम, समय, आय और घरेलू जीवन के बदलते रिश्ते की कहानी है।
आलेख- विकास चन्द्र अग्रवाल