mosbetlucky jetmostbetmosbetlucky jetparimatchaviatoraviatoronewin casinomostbet azmosbet1 winlucky jet casino4rabetmostbet aviator login4x bet1win casinopinup login1winlucky jet crash1winpinup kzmostbet casinopinup login1win slotsmostbetpin upmostbet kz1 win1win uzmostbet casino1win4r bet1 win kzlacky jetpin up 777mosbet aviatorpin upmostbetparimatch1 win1 winpin-upmostbet onlinepin-upmostbetpin up az1 win4rabet bd1win aviatorpin up azerbaycan

चावल का उत्पादन घटेगा, फिर भी भंडार भरे क्यों हैं?

चावल कम होगा, फिर भी भंडार भरे हैं ,फिर चिंता किस बात की?

उत्पादन में गिरावट का अनुमान,लेकिन सरकारी भंडार में पर्याप्त सुरक्षा-कुशन।क्या अब कृषि नीति को क्षेत्र में जल उपलब्धता और फसल-विविधीकरण पर भी ध्यान देना चाहिए?

भारत में इस वर्ष चावल का उत्पादन लगभग 6.5 प्रतिशत घटने का अनुमान है। पिछले वर्ष के लगभग 154 मिलियन टन के रिकॉर्ड उत्पादन की तुलना में इस बार करीब 10 मिलियन टन की कमी की संभावना जताई गई है। इसका एक प्रमुख कारण कई चावल उत्पादक क्षेत्रों में सामान्य से कम वर्षा और जलाशयों में घटता जलस्तर बताया गया है।

लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू भी महत्वपूर्ण है। 1 सितंबर 2026 को सरकारी व्यवस्था में चावल और बिना कुटे धान को मिलाकर लगभग 5.96 करोड़ टन का भंडार था। वहीं 1 अक्टूबर के लिए निर्धारित सरकारी बफर मानक में चावल की मात्रा करीब 1.03 करोड़ टन है। दोनों आंकड़ों की परिभाषा अलग होने के कारण इनकी सीधी तुलना करना उचित नहीं होगा, लेकिन इतना जरूर स्पष्ट है कि पिछले वर्षों के बड़े उत्पादन से देश के पास इस साल की संभावित कमी से निपटने के लिए पर्याप्त सुरक्षा-कुशन मौजूद है।

यहीं से एक बड़ा सवाल पैदा होता है। क्या हमारी कृषि नीति का लक्ष्य केवल अधिक से अधिक चावल पैदा करना होना चाहिए? यदि एक ओर हमारे भंडार पर्याप्त से अधिक हैं और दूसरी ओर खेती के लिए पानी का संकट बढ़ रहा है, तो हमें यह भी सोचना होगा कि किस क्षेत्र में कौन-सी फसल कितने पानी में उगाई जानी चाहिए। दलहन, तिलहन, फल, सब्जियाँ और दूसरी अधिक मूल्य वाली फसलें कई क्षेत्रों में किसानों को वैकल्पिक रास्ते दे सकती हैं,बशर्ते बाजार, भंडारण, प्रसंस्करण और उचित मूल्य की व्यवस्था साथ हो।

यह सवाल किसान के सामने केवल फसल बदलने का नहीं, जोखिम और आय के बीच संतुलन का भी है। चावल छोड़कर दूसरी फसल लगाने की सलाह देना आसान है, लेकिन किसान तभी बदलेगा जब उसे बाजार, कीमत, सिंचाई और खरीद की पर्याप्त सुरक्षा दिखाई दे। इसलिए फसल-विविधीकरण केवल कृषि विभाग की सलाह से नहीं, पूरी ग्रामीण अर्थव्यवस्था में बदलाव से संभव होगा।

भारत की खाद्य सुरक्षा केवल भरे हुए गोदामों से नहीं अपितु टिकाऊ खेती से भी तय होगी। आज हमारे पास भंडार का सुरक्षा-कुशन है; लेकिन क्या हम इसका इस्तेमाल ऐसी कृषि व्यवस्था बनाने में कर पाएँगे जिसमें किसान की आय सुरक्षित रहे, पानी बचे और देश की खाद्य सुरक्षा भी मजबूत बनी रहे?

यही आज की सबसे बड़ी कृषि चुनौती है कि हमें केवल अधिक अनाज नहीं, सही जगह पर सही फसल पैदा करनी होगी।

आलेख-विकास चन्द्र अग्रवाल

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *