DelhiRiots: दिल्ली में 72 घंटों की सांप्रदायिक हिंसा साबित करती है कि देश का आंतरिक सुरक्षा तंत्र बेहद कमज़ोर है!

आलोक मिश्रा-

दिल्ली के दंगों ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है की हजार 500 उन्मादी लोगों की भीड़ जब भी चाहे भारत में कहीं भी किसी भी शहर को जलाकर राख कर सकती है ,जब भी चाहे उन्मादी भीड़ दंगाइयों के गिरोह देश की कानून व्यवस्था की धज्जियां उड़ा सकते हैं लोगों का खून बहा सकते हैं और पुलिस तंत्र को भी कई दिनों तक बेबस और कमजोर साबित कर सकते हैं।

उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव की सरकार के दौरान जब मुजफ्फरनगर में दंगे हुए थे तब भी हालात कुछ इस तरह के बन गए थे, उसी तरह से समाज में नफरत फैल गई थी जिस तरह गृह युद्ध के दौरान नफरत फैलती है और लोग एक दूसरे के खून के प्यासे हो जाते हैं।
कुछ ऐसे ही हालात दिल्ली में बन गए और नागरिकता कानून का विरोध सुनियोजित हिंसा और नरसंहार में तब्दील हो गया जिसके बाद हिंसा सांप्रदायिक दंगों में तब्दील हो गई।

घटिया राजनीति के चलते इस देश के अलग-अलग इलाकों में साल छह महीने में कहीं न कहीं सांप्रदायिक हिंसा हिंदू मुस्लिम झगड़े की वारदातें होती रहती हैं कभी बिहार कभी बंगाल कभी उत्तर प्रदेश तो कभी दक्षिण भारत के किसी इलाके में लोग  सांप्रदायिक हिंसा का शिकार होते हैं और वहां का पुलिस तंत्र लकीर पीटते रह जाता है।
कार्रवाई की शुरुआत होती है लाशों का पोस्टमार्टम करवाने के बाद l लेकिन यहां पर बड़ा सवाल यह है कि जिस देश में सैकड़ों छोटे-बड़े दंगे हो चुके हैं वहां देश की आंतरिक सुरक्षा को लेकर ठोस कार्रवाई क्यों नहीं की जाती ?

भारत में बड़ी आसानी से हिंदू मुसलमानों को आपस में लड़ा देना स्वार्थी सियासी और मजहबी नेताओं का शगल बन गया है ऐसे में देश का सुरक्षा तंत्र इस चुनौती का लंबे समय से सामना कर रहा है और लगभग हर बार देश का सुरक्षा तंत्र सांप्रदायिक हिंसा की चुनौती के आगे बेबस नजर आता है। कई दिनों तक जब इंसानियत दंगों की आग में झुलस जाती है उसके बाद ही दंगे शांत होते हैं।

देश के गृह मंत्रालय को राज्यों के पुलिस विभाग से समन्वय स्थापित करके पूरे देश में सांप्रदायिक हिंसा पर कम से कम समय में काबू पाने की रणनीति काफी पहले ही बना लेनी थी जो अब तक कहीं भी दिखाई नहीं पड़ रही।
दुनिया के कई देश इस मामले में बहुत आगे हैं वहां कोई भी सांप्रदायिक हिंसा चंद घंटों के भीतर ही नियंत्रण में आ जाती है क्योंकि वहां की सुरक्षा एजेंसियां अपने खुफिया सूचना तंत्र और समाज के हर वर्ग में शामिल होकर काम करने वाले अपने अंडरकवर एजेंट के जरिए हर वर्ग की गतिविधियों और योजनाओं पर पैनी नजर और नियंत्रण रखते हैं ।
लेकिन भारत में सुरक्षा एजेंसियां देश के अंदर ऐसा नेटवर्क नहीं बना पाई हैं जबकि जरूरत इस बात की है कि देश के किसी भी शहर और गांव में कहीं भी अगर कुछ गड़बड़ हो रहा है हिंसा की कोई योजना बन रही है तो देश के सुरक्षा तंत्र को अपने नेटवर्क के माध्यम से न सिर्फ उसकी जानकारी मिल जानी चाहिए बल्कि व नेटवर्क इतना मजबूत होना चाहिए कि वह हिंसा शुरू होने के पहले ही खत्म कर दी जाए।

देश की नरेंद्र मोदी सरकार जिस तरह से देश में व्यापक सुधार की योजनाओं पर काम करने का दावा कर रही है धारा 370 राम मंदिर नागरिकता कानून जैसे बड़े मुद्दों पर सरकार ने फैसलों को लागू करवाने की बात कही है उसके बाद देश की आंतरिक सुरक्षा को लेकर चुनौती और बढ़ गई है क्योंकि देश के असंतुष्ट लोगों को भड़का कर हिंसा करवाने में देश विरोधी ताकतों को अब बहुत आसानी हो गई है। आने वाले समय में सरकार समान नागरिक संहिता और जनसंख्या कानून पर भी काम करने की बात कह रही है ऐसे में देश के आंतरिक सुरक्षा के हालत और चिंताजनक हो जाएगी यदि सरकार ने खासतौर पर गृह मंत्रालय ने इसको लेकर पहले से ही मजबूत कार्य योजना पर पूरी होशियारी से अमल नहीं किया।

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