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सत्ता के लिए विपक्षी फार्मूला “डिवाइड एंड रूल” हिंदू एकता को तोड़ कर जीतेंगे BJP का भगवा किला?

उत्तर प्रदेश में हुए 2017 के विधानसभा चुनाव और देश मे 2019 के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को मिले प्रचंड बहुमत में हिंदू समाज के “एकजुट मतदान” की बड़ी भूमिका मानी जाती है राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक भाजपा ने लंबे समय से जातियों में बंटे हुए हिंदुओं को एकजुट करके सत्ता का आसान समीकरण बनाया हालांकि हिंदुओं को एकजुट करना बहुत मुश्किल काम था लेकिन यदि अधिकांश हिंदू जातियों के लोग एकजुट होकर वोट करते हैं राजनीतिक रूप से “हिंदू वोट बैंक” बनकर आगे बढ़ते हैं तो सत्ता का रास्ता बहुत आसान हो जाता है।

बीजेपी की असली ताकत “संगठित हिंदू वोट बैंक” को तोड़ने पर विपक्ष का ध्यान:

अब हिंदुओं की इसी एकजुटता को तोड़कर भारतीय जनता पार्टी को सत्ता से बाहर करने की कोशिश पर दूसरे राजनीतिक दलों का पूरा जोर है। उत्तर प्रदेश में होने वाले 2022 के विधानसभा चुनाव की घड़ियां नजदीक है और पूरी ताकत से राजनीतिक दल अपने काम में जुटे हुए हैं। 5 साल से सत्ता से बाहर समाजवादी पार्टी किसी भी हाल में सत्ता को वापस पाना चाहती है और अखिलेश यादव दोबारा मुख्यमंत्री बनने के लिए कोई भी सियासी खेल खेलने के लिए तैयार हैं। अखिलेश यादव का ध्यान BJP की असली ताकत को कमजोर करना है और BJP की असली ताकत संगठित हिंदू वोट बैंक है यह सभी जानते हैं।

बेहद चालाकी के साथ मजबूत रणनीति को लागू कर रही है समाजवादी पार्टी:

समाजवादी पार्टी के रणनीतिकारों को यह अच्छी तरह पता है कि 2017 में भारतीय जनता पार्टी ने हिंदू समाज के अधिकांश जातियों को एकजुट करके प्रचंड बहुमत हासिल कर लिया था यादव समाज के भी बहुत से लोग धार्मिक आस्था के नाम पर कोई समझौता नहीं करना चाहते उनके मन में भी भाजपा के लिए सहानुभूति जगी है मुस्लिम तुष्टीकरण के मुद्दे को लेकर भारतीय जनता पार्टी ने हिंदू समाज के बड़े हिस्से को जागरूक किया है और इसका फायदा भी भाजपा को मिला है जो देश के तमाम प्रदेशों केंद्र और उत्तर प्रदेश की सत्ता के रूप में साफ दिखाई पड़ता है।


अब यदि भाजपा को सत्ता से बाहर करना है तो हिंदुओं की राजनीतिक एकता को तोड़ना गैर बीजेपी दलों के द्वारा आवश्यक माना जा रहा है। क्योंकि जब तक हिंदू समाज के अधिकांश जातियां एकजुट होकर वोट करती रहेंगी बीजेपी के लिए सत्ता का रास्ता आसान बना रहेगा। राजभर समाज के नेता ओमप्रकाश राजभर को भाजपा से अलग करके अपने खेमे में मिलाकर अखिलेश यादव ने सफलतापूर्वक एक कदम आगे बढ़ाया है,अब उनका ध्यान कथित तौर पर बड़ी जातियों के नेताओं पर है।

दूसरे दलों के असंतुष्ट ब्राह्मण नेता बने अखिलेश की पहली पसंद:

हिंदू समाज के संगठित मतदान में ब्राह्मणों का बड़ा योगदान है इसके साथ-साथ पिछड़े वर्गों और अनुसूचित वर्ग की जातियों ने भी एकजुट होकर भाजपा को चुनाव जिताया।
हिंदू समाज की सभी जातियां आपस में संबंध सुधारने और एक दूसरे को सम्मान देने पर भी ध्यान केंद्रित कर रही हैं समाज में ऊंच-नीच की भावना कम हुई है लोगों में आपसी व्यवहार खानपान भी तेजी से बढ़ रहा है। क्योंकि अब हिंदुत्व भी एक बड़ा वोट बैंक बन चुका है और हिंदू समाज की बहुत सी जातियां हिंदुत्व के नाम पर एकजुट होकर बीजेपी को वोट करती हैं इसलिए सत्ता में वापसी के लिए समाजवादी पार्टी हिंदुओं की एकता को तोड़ने पर ध्यान केंद्रित कर रही है। हिंदू समाज के बड़े सेगमेंट के रूप में वह ब्राह्मण समाज पर ध्यान लगा रहे हैं क्योंकि कुछ हिंदू जातियां खास तौर पर यादव और मुसलमानों का एकमुश्त वोट बैंक पहले से ही उनके पास है । सपा के वरिष्ठ नेता यह समझ चुके हैं कि उन्हें अपना वोट प्रतिशत और बढ़ाना होगा और इसके लिए यादव बंधुओं के साथ साथ हिंदू समाज के अन्य मतदाताओं को भी और अधिक संख्या में जोड़ना जरूरी है।

हरिशंकर तिवारी और राकेश पांडे के खेमे को हाथी से उतारकर साइकिल पर बैठा देना बड़ी सफलता:

ब्राह्मण समाज के तमाम चर्चित चेहरों को दूसरे दलों से अपने दल में शामिल करने को सपा नेता अपनी बड़ी सफलता मान रहे हैं यदि आधे ब्राह्मण भी सपा को वोट कर देते हैं तो समाजवादी पार्टी के लिए सत्ता की राहें आसान हो जाएंगी।
“ब्राह्मणवाद का सहारा लेकर समाजवाद की सत्ता” का समीकरण बनाने में जुटे अखिलेश यादव के इस सियासी फार्मूला ने भाजपा के बड़े नेताओं की नींद उड़ा दी है। बसपा का तो बड़ा नुकसान होना तय माना जा रहा है। ब्राह्मण लंबे समय से बीजेपी का कोर वोटर माना जाता रहा है उत्तर प्रदेश में लगभग 15% की आबादी के साथ ब्राह्मण एक निर्णायक वोट बैंक है इसीलिए समाजवादी पार्टी 2022 में पंडितों का आशीर्वाद चाहती है। गोरखपुर से हरिशंकर तिवारी के परिवार और अंबेडकर नगर से पूर्व सांसद राकेश पांडे का समाजवादी खेमे में आना सपा के लिए फायदेमंद माना जा रहा है । सियासी पंडितों के मुताबिक कृष्ण और सुदामा की पुरानी दोस्ती के “रामबाण” के जरिए समाजवादी पार्टी रामराज्य का दावा करने वाली भाजपा को राजनीति के युद्ध क्षेत्र में धराशाई करना चाहती है।

दीपक मिश्रा
द इंडियन ओपिनियन, लखनऊ

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