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वडोदरा से वाराणसी तक: 25 वर्षों की वह यात्रा जिसने भारत की राजनीति और विकास की दिशा बदल दी

कार्यकर्ता से मुख्यमंत्री, मुख्यमंत्री से प्रधानमंत्री और प्रधानमंत्री से ‘विकसित भारत’ के संकल्प तक—नरेंद्र मोदी के 25 वर्ष

PM Narendra Modi
PM Narendra Modi

राजनीति में कुछ यात्राएं पदों की सीढ़ियां चढ़ने की कहानी होती हैं और कुछ यात्राएं किसी देश के बदलते समय की कहानी बन जाती हैं। नरेंद्र मोदी की 25 वर्षों की सार्वजनिक जीवन यात्रा को दूसरी श्रेणी में रखा जा सकता है।
7 अक्टूबर 2001 को गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी ने जब पहली बार राज्य की सत्ता की जिम्मेदारी संभाली थी, तब शायद ही किसी ने कल्पना की होगी कि वडनगर से निकला एक संगठन कार्यकर्ता आगे चलकर भारत का सबसे लंबे समय तक लगातार निर्वाचित प्रधानमंत्री बनने का रिकॉर्ड बनाएगा।
10 जून 2026 को यह ऐतिहासिक पड़ाव आया, जब नरेंद्र मोदी ने लगातार 4,399 दिन निर्वाचित प्रधानमंत्री के रूप में कार्य पूरा किया और जवाहरलाल नेहरू के 4,398 दिनों के रिकॉर्ड को पीछे छोड़ दिया। 4,399 दिन केवल समय की गणना नहीं बल्कि ये भारत के शासन, राजनीति, अर्थव्यवस्था, सामाजिक कल्याण, डिजिटल व्यवस्था, बुनियादी ढांचे और वैश्विक भूमिका में आए बदलावों को देखने का एक अवसर भी हैं।

17 सितंबर 2026 को नरेंद्र मोदी 76 वर्ष के होंगे और 7 अक्टूबर 2026 को सार्वजनिक जीवन में 25 वर्ष पूरे करेंगे।
इन दोनों अवसरों को केवल एक नेता की व्यक्तिगत उपलब्धि के रूप में देखना इस यात्रा को छोटा करके देखना होगा। यह पिछले ढाई दशकों में भारत की राजनीतिक प्राथमिकताओं और विकास की दिशा में आए परिवर्तन का भी अवसर है।

वडनगर से वडोदरा और वडोदरा से वाराणसी
नरेंद्र मोदी की कहानी सत्ता के गलियारों से शुरू नहीं हुई। वह संगठन के एक सामान्य कार्यकर्ता के रूप में आगे बढ़े। गुजरात में संगठनात्मक जिम्मेदारियों से लेकर मुख्यमंत्री पद तक पहुंचने के बाद 2014 ने उनके जीवन में एक निर्णायक मोड़ पैदा किया।
2014 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने वडोदरा और वाराणसी दोनों सीटों से चुनाव लड़ा और दोनों जगह जीत दर्ज की। स्वयं प्रधानमंत्री ने बाद में वडोदरा और काशी को अपने राजनीतिक जीवन के उस महत्वपूर्ण क्षण से जोड़ा है।

वडोदरा गुजरात की उस राजनीतिक यात्रा का प्रतीक था, जिसने उन्हें राष्ट्रीय नेतृत्व तक पहुंचाया।
वाराणसी ने उस यात्रा को राष्ट्रीय पहचान दी।
यही कारण है कि “वडोदरा से वाराणसी” केवल दो लोकसभा क्षेत्रों के बीच की दूरी नहीं है। यह क्षेत्रीय नेतृत्व के राष्ट्रीय नेतृत्व में रूपांतरण की कहानी है।
शायद इसी लिए 2014 के लोकसभा चुनाव में वाराणसी से अपना नामांकन पत्र दाखिल करते समय नरेंद्र मोदी ने कहा – ना मैं नया आया हूं, ना मुझे यहां लाया गया है, मुझे मां गंगा ने बुलाया है।

पहली बड़ी परीक्षा: भूकंप से पुनर्निर्माण तक
गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी के सामने शुरुआती वर्षों में सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक 2001 का भुज भूकंप था।
विनाशकारी भूकंप ने गुजरात के बड़े हिस्से को प्रभावित किया। हजारों लोगों की जान गई और घरों, सड़कों, स्कूलों, अस्पतालों तथा अन्य बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान पहुंचा। आपदा के बाद पुनर्वास और पुनर्निर्माण ने शासन की क्षमता की परीक्षा ली।
यहीं से मोदी के प्रशासनिक दृष्टिकोण की एक विशेषता दिखाई देने लगी—संकट का जवाब केवल राहत से नहीं, बल्कि पुनर्निर्माण और दीर्घकालिक व्यवस्था निर्माण से देना।
गुजरात के बाद यही सोच राष्ट्रीय स्तर पर दिखाई दी—बड़ी समस्या के सामने बड़े पैमाने का प्रशासनिक उत्तर।

2014: सत्ता परिवर्तन से शासन की नई शैली तक
2014 का चुनाव नरेंद्र मोदी के लिए केवल सत्ता परिवर्तन नहीं था। यह शासन की एक नई शैली का आरंभ भी था।
जनधन, स्वच्छ भारत, उज्ज्वला, मुद्रा, पीएम-किसान, आवास, जल जीवन, आयुष्मान भारत और डिजिटल इंडिया जैसी योजनाओं की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता केवल उनका नाम नहीं, बल्कि उनका पैमाना और प्रत्यक्ष लाभ पहुंचाने की कोशिश रही।
यही वह दौर था जब सरकारी योजनाओं के साथ एक नया शब्द तेजी से जुड़ा—DBT यानी Direct Benefit Transfer।
जनधन, आधार और मोबाइल की JAM त्रिमूर्ति ने बैंकिंग, पहचान और मोबाइल कनेक्टिविटी को सरकारी सहायता वितरण के साथ जोड़ने का आधार तैयार किया।
जून 2026 तक 58.63 करोड़ से अधिक जनधन खाते खोले जा चुके थे। इनमें 32.68 करोड़ खाते महिलाओं के थे और 45.62 करोड़ खाते ग्रामीण एवं अर्ध-शहरी क्षेत्रों में थे। जनधन खातों में जमा राशि ₹3 लाख करोड़ से अधिक थी।
यानी जिस व्यक्ति के पास पहले बैंक खाता तक नहीं था, वह अब औपचारिक वित्तीय व्यवस्था का हिस्सा बन चुका था। यही बदलाव आगे चलकर कल्याणकारी योजनाओं की रीढ़ बना।

किसान: सहायता से आय-सुरक्षा की ओर
भारत की राजनीति में किसान हमेशा केंद्रीय विषय रहा है। लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में किसान कल्याण को प्रत्यक्ष आय सहायता, बीमा, बाजार और तकनीक से जोड़ने की कोशिश हुई।
प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।
20 जून 2026 को PM-KISAN की 23वीं किस्त के रूप में 9.44 करोड़ से अधिक किसानों को ₹18,880 करोड़ से अधिक सीधे बैंक खातों में हस्तांतरित किए गए। इनमें 2.18 करोड़ से अधिक महिला किसान थीं। योजना शुरू होने से अब तक ₹4.46 लाख करोड़ से अधिक की राशि वितरित की जा चुकी है।
₹4.46 लाख करोड़ केवल एक वित्तीय आंकड़ा नहीं है। यह बताता है कि देश में पहली बार करोड़ों किसानों को नियमित प्रत्यक्ष आय सहायता देने की एक राष्ट्रीय व्यवस्था कितने बड़े स्तर तक पहुंची।
इसके साथ प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना, ई-नाम, मृदा स्वास्थ्य कार्ड, सिंचाई विस्तार, कृषि अवसंरचना और कृषि में ड्रोन जैसी पहलें किसान को केवल उत्पादनकर्ता नहीं, बल्कि आधुनिक अर्थव्यवस्था के सक्रिय भागीदार के रूप में देखने की दिशा में आगे बढ़ती हैं।

नारी शक्ति: लाभार्थी से नेतृत्व तक
मोदी सरकार के दौर में महिला सशक्तीकरण की भाषा भी बदली है।
पहले चर्चा अक्सर “महिला कल्याण” तक सीमित रहती थी। अब “महिला-नेतृत्व वाला विकास” राजनीतिक और आर्थिक विमर्श का हिस्सा बन चुका है।
उज्ज्वला योजना ने करोड़ों गरीब परिवारों की महिलाओं को LPG कनेक्शन से जोड़ा। जनधन ने महिलाओं को बैंकिंग व्यवस्था में बड़ी संख्या में शामिल किया। स्वयं सहायता समूहों, मुद्रा, लखपति दीदी और ड्रोन दीदी जैसी पहलों ने महिलाओं को आर्थिक गतिविधियों से जोड़ने की कोशिश की।
जनधन के 58.63 करोड़ से अधिक खातों में 32.68 करोड़ खाते महिलाओं के होना अपने आप में इस बदलाव का एक बड़ा संकेत है।
यह परिवर्तन केवल बैंक खाते का नहीं है।
बैंक खाते से बचत, बचत से ऋण, ऋण से उद्यम और उद्यम से आत्मनिर्भरता—यही महिला सशक्तीकरण की अगली सीढ़ी है।

मुद्रा: नौकरी मांगने वाले से नौकरी देने वाले तक
भारत जैसे युवा देश के सामने सबसे बड़ी आर्थिक चुनौतियों में से एक रोजगार के पर्याप्त अवसर पैदा करना है। हर युवा को सरकारी नौकरी देना संभव नहीं है। इसलिए स्वरोजगार, सूक्ष्म उद्योग और उद्यमिता को बढ़ावा देना आवश्यक है।
प्रधानमंत्री मुद्रा योजना ने इसी आवश्यकता को संबोधित किया।
मुद्रा का सबसे बड़ा संदेश यह रहा कि छोटे कारोबारी को भी औपचारिक वित्तीय व्यवस्था से जोड़ा जा सकता है—चाहे वह दुकान चलाता हो, सर्विस सेंटर, छोटा विनिर्माण व्यवसाय या कोई अन्य सूक्ष्म उद्यम।
इसके समानांतर Startup India ने भारत में उद्यमिता की संस्कृति को व्यापक बनाया। सरकार के अनुसार भारत दुनिया के प्रमुख स्टार्टअप पारिस्थितिक तंत्रों में तीसरे स्थान पर पहुंच चुका है। PLI योजनाओं के तहत मार्च 2026 तक ₹2.40 लाख करोड़ से अधिक वास्तविक निवेश आया और 14.15 लाख से अधिक प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रोजगार सृजित हुए।
यह बदलाव महत्वपूर्ण है क्योंकि यह अर्थव्यवस्था की मानसिकता को बदलता है— सरकार रोजगार देने वाली संस्था भर नहीं; सरकार ऐसा वातावरण बनाए जिसमें नागरिक रोजगार पैदा कर सकें।

गरीब कल्याण: सरकारी योजना से नागरिक के जीवन तक
किसी भी सरकार की वास्तविक परीक्षा उसकी घोषणाओं से नहीं, बल्कि अंतिम व्यक्ति तक पहुंच से होती है।
स्वच्छ भारत मिशन ने करोड़ों शौचालयों के निर्माण के माध्यम से स्वच्छता को राष्ट्रीय जनअभियान बनाया।
प्रधानमंत्री आवास योजना ने गरीब परिवारों के लिए पक्के घर को सरकारी नीति का प्रमुख लक्ष्य बनाया।
जल जीवन मिशन ने ग्रामीण परिवारों तक नल से जल पहुंचाने को राष्ट्रीय अभियान बनाया।
आयुष्मान भारत ने गरीब परिवारों के लिए स्वास्थ्य सुरक्षा का नया ढांचा तैयार किया।
अगस्त 2026 तक आयुष्मान भारत PM-JAY के अंतर्गत 45.5 करोड़ से अधिक आयुष्मान कार्ड जारी किए जा चुके थे। 12.69 करोड़ अस्पताल दाखिलों को कवर किया गया, जिनकी राशि ₹1.92 लाख करोड़ थी। 38,466 से अधिक सरकारी और निजी अस्पताल इस व्यवस्था से जुड़े थे।
यहां शासन का एक नया मॉडल दिखाई देता है— पहचान – पात्रता – डिजिटल रिकॉर्ड – सीधे लाभ – निगरानी।
यही डिजिटल शासन की वह संरचना है जिसने पिछले दशक में कल्याणकारी योजनाओं के विस्तार को संभव बनाया।

कोरोना: संकट के समय राज्य की भूमिका
कोरोना महामारी ने दुनिया के हर शासन मॉडल को चुनौती दी।
भारत के सामने एक साथ स्वास्थ्य संकट, रोजगार संकट, प्रवासी संकट, खाद्य सुरक्षा और आर्थिक गतिविधियों को बनाए रखने की चुनौती थी।
मुफ्त खाद्यान्न, प्रत्यक्ष सहायता और दुनिया के सबसे बड़े टीकाकरण अभियानों में से एक ने इस संकट में राज्य की भूमिका को व्यापक बनाया।
महामारी ने एक और सबक दिया—मजबूत स्वास्थ्य व्यवस्था के साथ मजबूत डिजिटल और प्रशासनिक व्यवस्था भी जरूरी है।
आज आयुष्मान भारत के साथ Ayushman Arogya Mandirs का विस्तार प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा को भी नई दिशा दे रहा है। अगस्त 2026 तक 1.86 लाख से अधिक आयुष्मान आरोग्य मंदिर कार्यरत थे और इन पर 540 करोड़ से अधिक फुटफॉल दर्ज किया जा चुका था।

UPI: भारत की डिजिटल क्रांति की सबसे दिखाई देने वाली कहानी
यदि पिछले दशक के भारत के परिवर्तन को किसी एक संख्या में समझना हो तो वह संख्या UPI हो सकती है।
वित्त वर्ष 2016-17 में UPI पर केवल 1.78 करोड़ लेन-देन हुए थे। वित्त वर्ष 2025-26 में यही संख्या बढ़कर 24,161.69 करोड़ लेन-देन हो गई और इनका कुल मूल्य लगभग ₹314.23 लाख करोड़ रहा। जून 2026 तक UPI से जुड़े उपयोगकर्ताओं की संख्या 55.49 करोड़ थी। जुलाई 2026 तक 741 बैंक UPI पर लाइव थे और UPI दुनिया के रियल-टाइम भुगतान के लगभग 49 प्रतिशत वॉल्यूम का प्रतिनिधित्व कर रहा था।
किसी छोटे दुकानदार का QR कोड, किसी रिक्शा चालक का डिजिटल भुगतान और किसी ग्रामीण परिवार का मोबाइल से पैसे भेजना—ये छोटे दृश्य मिलकर एक बहुत बड़ा परिवर्तन बताते हैं। भारत ने डिजिटल भुगतान को केवल सुविधा नहीं, बल्कि सार्वजनिक डिजिटल ढांचा बना दिया।

सड़कें: देश को जोड़ने का नया पैमाना
किसी देश का विकास उसके हाईवे, रेलवे और हवाई अड्डों से भी पढ़ा जा सकता है।
राष्ट्रीय राजमार्गों की लंबाई मार्च 2014 के 91,287 किलोमीटर से बढ़कर मार्च 2026 में 1,46,572 किलोमीटर हो गई। चार लेन या उससे अधिक के राष्ट्रीय राजमार्ग 18,371 किलोमीटर से बढ़कर 45,516 किलोमीटर हुए। भारतमाला के अंतर्गत मार्च 2026 तक 22,590 किलोमीटर सड़कें पूरी की जा चुकी थीं।
इन आंकड़ों का अर्थ केवल अधिक किलोमीटर सड़क नहीं है। तेज सड़क का अर्थ है कम यात्रा समय, तेज माल परिवहन, बेहतर बाजार पहुंच, अधिक पर्यटन और उद्योगों के लिए बेहतर लॉजिस्टिक्स। सड़क विकास अंततः आर्थिक उत्पादकता का विकास है।

रेलवे: गति, विद्युतीकरण और नई तकनीक
भारतीय रेल केवल परिवहन का माध्यम नहीं; यह भारत की आर्थिक जीवनरेखा है।
2014 से पहले लगभग 20 प्रतिशत ब्रॉडगेज रेल नेटवर्क विद्युतीकृत था। जुलाई 2026 तक यह आंकड़ा 99.6 प्रतिशत तक पहुंच गया। वित्त वर्ष 2026-27 में रेलवे का बजट ₹2.78 लाख करोड़ तक पहुंचा। 162 वंदे भारत, 2 वंदे भारत स्लीपर और 72 अमृत भारत सेवाएं परिचालन में थीं। अमृत भारत स्टेशन योजना के तहत 1,340 स्टेशनों के पुनर्विकास की योजना बनाई गई और जुलाई 2026 तक 261 स्टेशनों का पुनर्विकास पूरा हो चुका था। कश्मीर में चिनाब रेलवे पुल भारतीय इंजीनियरिंग की दुनिया में मिसाल है।
यह बदलाव रेलवे को केवल “यात्रा” से “अनुभव और कनेक्टिविटी” की ओर ले जाने की कोशिश है।

हवाई संपर्क: छोटे शहरों के लिए खुलते आकाश
2014 में भारत में 74 परिचालन हवाई अड्डे थे।
जुलाई 2026 तक यह संख्या बढ़कर 165 हो गई। 2014 के बाद 25 ग्रीनफील्ड हवाई अड्डों को मंजूरी दी गई। UDAN जैसी योजनाओं ने छोटे शहरों और क्षेत्रीय केंद्रों को हवाई नेटवर्क से जोड़ने का प्रयास किया। इसका सबसे बड़ा प्रभाव उन क्षेत्रों पर पड़ता है जहां पहले दिल्ली, मुंबई, हैदराबाद या बेंगलुरु जैसे बड़े शहरों तक पहुंचने में लंबा समय लगता था।
हवाई संपर्क केवल यात्रियों के लिए सुविधा नहीं है। यह पर्यटन, निवेश, शिक्षा, स्वास्थ्य और व्यवसाय का नया द्वार है।

विनिर्माण: ‘मेक इन इंडिया’ से ‘मेक फॉर द वर्ल्ड’
2014 के बाद भारत की आर्थिक रणनीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव यह रहा कि सेवा क्षेत्र की शक्ति के साथ विनिर्माण को भी राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाया गया।
मेक इन इंडिया, आत्मनिर्भर भारत और PLI योजनाओं ने इस दिशा में नई नीति संरचना तैयार की।
PLI के अंतर्गत 14 प्रमुख क्षेत्रों में मार्च 2026 तक ₹2.40 लाख करोड़ से अधिक का वास्तविक निवेश आया। उत्पादन/बिक्री ₹22.66 लाख करोड़ से अधिक रही और 14.15 लाख से अधिक प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रोजगार उत्पन्न हुए। निर्यात ₹15.20 लाख करोड़ से अधिक रहा।
इलेक्ट्रॉनिक्स और मोबाइल विनिर्माण इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण है। भारत अब केवल मोबाइल फोन का बड़ा बाजार नहीं, बल्कि मोबाइल और इलेक्ट्रॉनिक्स के बड़े विनिर्माण केंद्रों में शामिल है। सेमीकंडक्टर निर्माण की दिशा में उठाए गए कदम भी इसी दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा हैं। यदि भारत अगले दशक में वैश्विक सप्लाई चेन का महत्वपूर्ण केंद्र बनता है, तो इस परिवर्तन की नींव इसी दौर की नीतियों में खोजी जाएगी।

सुरक्षित भारत से सामर्थ्यवान भारत: विदेश नीति, सीमा सुरक्षा और रक्षा शक्ति का विस्तार
नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत की विदेश और सुरक्षा नीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव दिखाई देता है। भारत ने जहां अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को बनाए रखते हुए अमेरिका, फ्रांस, जापान, ऑस्ट्रेलिया और पश्चिम एशिया के देशों के साथ संबंधों को नई ऊंचाई दी, वहीं रूस जैसे पारंपरिक रणनीतिक साझेदार के साथ संबंधों को भी जारी रखा। यह नीति किसी एक शक्ति-गुट के साथ खड़े होने के बजाय भारत के राष्ट्रीय हितों के आधार पर बहुसंरेखीय साझेदारियां विकसित करने की रही है।
2023 में भारत की G20 अध्यक्षता इस कूटनीतिक सक्रियता का बड़ा उदाहरण बनी। भारत ने पहली बार अफ्रीकी संघ को G20 का स्थायी सदस्य बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और ग्लोबल साउथ के मुद्दों को वैश्विक एजेंडे के केंद्र में लाने का प्रयास किया। विदेश मंत्रालय के अनुसार, भारत की G20 अध्यक्षता के दौरान ग्लोबल साउथ की चिंताओं को G20 की चर्चाओं में व्यापक रूप से शामिल किया गया।
इसी क्रम में 2023 में भारत ने Voice of Global South Summit की मेजबानी की, जिसमें विकासशील देशों को साझा मंच देने की पहल की गई। यह भारत की विदेश नीति में आए उस परिवर्तन का संकेत है जिसमें भारत स्वयं को केवल किसी दूसरे शक्ति-केंद्र के साथ खड़े देश के रूप में नहीं, बल्कि वैश्विक एजेंडा को प्रभावित करने वाली शक्ति के रूप में प्रस्तुत कर रहा है।

सीमा पर बदली रणनीति
विदेश नीति की शक्ति का वास्तविक परीक्षण सीमा पर होता है।
मोदी सरकार के वर्षों में सीमा अवसंरचना को राष्ट्रीय सुरक्षा का अभिन्न हिस्सा बनाया गया। विशेषकर चीन और पाकिस्तान से लगती सीमाओं पर सड़क, पुल, सुरंग, हवाई पट्टी और संचार नेटवर्क के निर्माण में तेजी आई। सीमा सड़क संगठन ने 2024 और 2025 के दौरान 356 अवसंरचना परियोजनाएं राष्ट्र को समर्पित कीं। 2024–25 में BRO का व्यय ₹16,690 करोड़ के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा और 2025–26 के लिए ₹17,900 करोड़ का व्यय लक्ष्य निर्धारित किया गया।
इन परियोजनाओं का महत्व केवल सैनिकों की आवाजाही तक सीमित नहीं है। सीमा क्षेत्रों में सड़क और पुल बनने का अर्थ स्थानीय आबादी के लिए बेहतर कनेक्टिविटी, पर्यटन, रोजगार और आर्थिक गतिविधियों का विस्तार भी है।
सीमा विकास अब केवल “सीमा तक सड़क” का विषय नहीं रहा, यह “सीमा को विकास की मुख्यधारा से जोड़ने” की रणनीति बन गया है।

सर्जिकल स्ट्राइक से ऑपरेशन सिंदूर तक
2016 की सर्जिकल स्ट्राइक ने आतंकवाद के खिलाफ भारत की जवाबी नीति को नया राजनीतिक और सामरिक संदेश दिया। 2019 की बालाकोट कार्रवाई ने इस नीति को और स्पष्ट किया।
2025 के पहलगाम आतंकी हमले के बाद ऑपरेशन सिंदूर ने एक बार फिर भारत की आतंकवाद विरोधी नीति को वैश्विक चर्चा में ला दिया। रक्षा नीति की कहानी केवल जवाबी कार्रवाई की कहानी नहीं है। उससे कहीं बड़ा परिवर्तन रक्षा क्षमता के स्वदेशीकरण में है।
आज भारत का लक्ष्य केवल हथियार खरीदना नहीं, बल्कि हथियार बनाना और उन्हें वैश्विक बाजार में निर्यात करना भी है।
खरीदार भारत से निर्यातक भारत
रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भरता मोदी सरकार की सुरक्षा नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बनी है।
भारत का रक्षा निर्यात वित्त वर्ष 2025–26 में रिकॉर्ड ₹23,622 करोड़ तक पहुंच गया। जिस देश को लंबे समय तक दुनिया के बड़े रक्षा आयातकों में गिना जाता था, वही देश अब मिसाइल, आर्टिलरी सिस्टम, हेलिकॉप्टर, नौसैनिक उपकरण, इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम और अन्य रक्षा उत्पादों का निर्यातक बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। इस परिवर्तन में निजी उद्योग, DRDO, सार्वजनिक क्षेत्र की रक्षा कंपनियों, स्टार्टअप और MSME क्षेत्र की बढ़ती भागीदारी भी महत्वपूर्ण है।

सीमा, विस्तार, अंडमान-निकोबार और लक्षद्वीप जैसे रणनीतिक क्षेत्रों पर ध्यान, समुद्री डोमेन जागरूकता, उपग्रह आधारित निगरानी और इंड समुद्र और आकाश—तीनों मोर्चों पर विस्तार
भारत की सुरक्षा अवधारणा अब केवल थल सीमा तक सीमित नहीं है।
हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की भूमिका, नौसैनिक क्षमता का विस्तार, अंडमान-निकोबार और लक्षद्वीप जैसे रणनीतिक क्षेत्रों पर ध्यान, समुद्री डोमेन जागरूकता, उपग्रह आधारित निगरानी और इंडो-पैसिफिक में साझेदारियां भारत की सुरक्षा नीति को व्यापक बनाती हैं। इसी तरह ड्रोन, एंटी-ड्रोन सिस्टम, उपग्रह, साइबर सुरक्षा, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध आने वाले समय की सुरक्षा क्षमता के महत्वपूर्ण आधार बन रहे हैं।
इस दौर की रक्षा नीति को केवल “सेना को अधिक हथियार देने” के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। यह एकीकृत राष्ट्रीय शक्ति—आर्थिक क्षमता, तकनीक, उद्योग, कूटनीति और सैन्य शक्ति—के निर्माण की प्रक्रिया है।

निर्णायक राजनीतिक फैसले
नरेंद्र मोदी सरकार के कार्यकाल में कई ऐसे फैसले हुए जिनका प्रभाव प्रशासनिक दायरे से कहीं आगे तक गया।
अनुच्छेद 370 में बदलाव, तीन तलाक के खिलाफ कानून, नागरिकता संशोधन कानून, अयोध्या में राम मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त होना और नए संसद भवन का निर्माण—ये ऐसे निर्णय हैं जिन्होंने भारत के राजनीतिक विमर्श को गहराई से प्रभावित किया।
इन फैसलों को लेकर देश में समर्थन और विरोध दोनों रहे हैं। लेकिन लोकतांत्रिक राजनीति में किसी सरकार की राजनीतिक विरासत का मूल्यांकन करते समय यह देखना भी आवश्यक है कि उसके निर्णयों ने राष्ट्रीय विमर्श की दिशा को कितना प्रभावित किया।
इस कसौटी पर मोदी युग भारतीय राजनीति के सबसे प्रभावशाली दौरों में गिना जाएगा।

अर्थव्यवस्था: चुनौती से आत्मविश्वास तक
पिछले 12 वर्षों में भारतीय अर्थव्यवस्था ने महामारी, युद्ध, ऊर्जा संकट, वैश्विक महंगाई और आपूर्ति श्रृंखला की बाधाओं जैसी अनेक चुनौतियों का सामना किया है।
इसके बावजूद भारत दुनिया की सबसे तेज गति से बढ़ने वाली बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में बना हुआ है। सरकार के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष 2025-26 में वास्तविक GDP वृद्धि 7.7 प्रतिशत रही लेकिन अर्थव्यवस्था का अगला लक्ष्य केवल विकास दर नहीं हो सकता।
भारत को अब अधिक रोजगार, अधिक विनिर्माण, अधिक निर्यात, अधिक उत्पादकता और उच्च प्रति व्यक्ति आय की दिशा में बढ़ना होगा। यहीं से विकसित भारत 2047 की असली चुनौती शुरू होती है।

आंध्र प्रदेश: राष्ट्रीय विकास दृष्टि का क्षेत्रीय विस्तार
आंध्र प्रदेश के लिए नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र-राज्य सहयोग का विशेष महत्व है।
अमरावती के विकास, पोलावरम परियोजना, रेलवे, औद्योगिक गलियारों और भोगापुरम अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे जैसी परियोजनाएं राज्य के भविष्य के आर्थिक भूगोल को प्रभावित करने की क्षमता रखती हैं।
अमरावती में मई 2025 में ₹58,000 करोड़ से अधिक की विभिन्न विकास परियोजनाओं का उद्घाटन और शिलान्यास हुआ।
पोलावरम के लिए केंद्र की संचयी वित्तीय सहायता ₹20,658 करोड़ तक पहुंची है।
भोगापुरम में अगस्त 2026 में ₹17,900 करोड़ से अधिक की विभिन्न परियोजनाओं का उद्घाटन और शिलान्यास हुआ।
भोगापुरम हवाई अड्डा केवल एक हवाई अड्डा नहीं है। यह उत्तर आंध्र के लिए पर्यटन, उद्योग, रोजगार और शहरी विकास के नए अवसरों का आधार बन सकता है।
यही डबल इंजन विकास की वास्तविक अवधारणा है—जब केंद्र और राज्य की प्राथमिकताएं एक-दूसरे की ताकत बनें।

मोदी मॉडल की असली पहचान: पैमाना, गति और तकनीक
नरेंद्र मोदी के शासन मॉडल को तीन शब्दों में समझने की कोशिश की जा सकती है— पैमाना। गति। तकनीक।
पैमाना इसलिए कि योजनाएं करोड़ों लोगों तक पहुंचाई गईं।
गति इसलिए कि सरकार ने परियोजनाओं और लाभ वितरण को समयबद्ध करने पर जोर दिया।
तकनीक इसलिए कि आधार, मोबाइल, UPI, DBT, डिजिटल स्वास्थ्य और डिजिटल शासन को सार्वजनिक सेवा वितरण का हिस्सा बनाया गया।
लेकिन इन तीनों के पीछे चौथा तत्व भी है—
जनभागीदारी।
स्वच्छ भारत हो, डिजिटल भुगतान हो, योग हो, फिट इंडिया हो या हर घर तिरंगा—मोदी सरकार की राजनीतिक शैली ने सरकारी कार्यक्रमों को जनअभियान में बदलने की कोशिश की।

अब सबसे कठिन अध्याय: विकसित भारत 2047
25 वर्ष की सार्वजनिक जीवन यात्रा पूरी करना बड़ी उपलब्धि है लेकिन नरेंद्र मोदी के सामने अब तक की सबसे बड़ी चुनौती भी यही समय लेकर आया है। विकसित भारत 2047 का लक्ष्य केवल GDP बढ़ाने का लक्ष्य नहीं है।
यह भारत को ऐसा राष्ट्र बनाने की कल्पना है जहां—
गरीबी न्यूनतम हो, मध्यम वर्ग अधिक समृद्ध हो, किसान अधिक उत्पादक हो, महिलाएं अधिक आर्थिक रूप से स्वतंत्र हों, युवा दुनिया के सबसे बड़े अवसरों से जुड़ा हो, भारत विश्वस्तरीय विनिर्माण केंद्र बने, शहर रहने योग्य और गांव अवसरों से जुड़े हों, स्वास्थ्य और शिक्षा की गुणवत्ता वैश्विक स्तर की हो, भारत ऊर्जा और तकनीक में अधिक आत्मनिर्भर हो और वैश्विक मंच पर भारत केवल बाजार नहीं, बल्कि समाधान देने वाली शक्ति बने।
यह लक्ष्य किसी एक सरकार से पूरा नहीं होगा। इसके लिए आने वाले दो दशकों में राजनीतिक स्थिरता, आर्थिक सुधार, सामाजिक विश्वास, संस्थागत क्षमता और नागरिक भागीदारी की आवश्यकता होगी।

वडोदरा से वाराणसी—और अब विकसित भारत
वडोदरा ने नरेंद्र मोदी के राष्ट्रीय राजनीतिक उदय को चुनावी पहचान दी। वाराणसी ने उस यात्रा को भारत की सांस्कृतिक और राजनीतिक चेतना से जोड़ा। गुजरात ने उन्हें शासन का अनुभव दिया। दिल्ली ने उन्हें पूरे देश के नेतृत्व की जिम्मेदारी दी।
अब विकसित भारत 2047 उन्हें एक ऐसी चुनौती के सामने खड़ा कर रहा है, जिसकी तुलना किसी चुनाव या एक कार्यकाल से नहीं की जा सकती।
यह चुनौती एक पूरी पीढ़ी के भविष्य की है।
25 वर्ष पहले एक संगठन कार्यकर्ता ने गुजरात की जिम्मेदारी संभाली थी। आज वही राजनीतिक यात्रा भारत को 2047 तक विकसित राष्ट्र बनाने के संकल्प के साथ आगे बढ़ रही है। इसलिए नरेंद्र मोदी की 25 वर्ष की यात्रा को केवल “सत्ता की यात्रा” कहना इसके व्यापक अर्थ को सीमित करना होगा।
यह एक ऐसी राजनीतिक यात्रा है जिसमें संगठन से शासन आया, शासन से जनकल्याण का विस्तार हुआ, जनकल्याण से डिजिटल व्यवस्था बनी, डिजिटल व्यवस्था से आर्थिक अवसरों का विस्तार हुआ और अब इन सबको एक बड़े राष्ट्रीय लक्ष्य—विकसित भारत—में जोड़ने का प्रयास हो रहा है।
आखिरकार किसी भी नेता की सबसे बड़ी पहचान उसके पद की अवधि नहीं होती।
उसकी पहचान इस बात से होती है कि उसने अपने समय की चुनौतियों के सामने कैसी दिशा चुनी और अपने पीछे कैसी संभावनाएं छोड़ीं।
नरेंद्र मोदी की 25 वर्षों की सार्वजनिक जीवन यात्रा इसी कसौटी पर अब एक नए अध्याय में प्रवेश कर रही है।

वडनगर से वडोदरा। वडोदरा से वाराणसी। वाराणसी से दिल्ली। दिल्ली से विकसित भारत।
आचार्य चाणक्य ने शासन और नेतृत्व के संदर्भ में कहा था कि जब राजा कमजोर न हो, रणनीति में पैना हो और राज्य की शक्ति को समझता हो, तब न केवल उसका अपना राज्य प्रगति करता है, बल्कि शत्रु भी उस पर दृष्टि डालने से पहले कई बार सोचता है।
यह यात्रा अभी समाप्त नहीं हुई है। अगला पड़ाव 2047 है।

 

लिंगमनेनी रमेश, सांसद (राज्यसभा)
लिंगमनेनी रमेश, सांसद (राज्यसभा)

— लिंगमनेनी रमेश, सांसद (राज्यसभा)

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