ग्लेशियल झीलों के बढ़ते आकार और बाढ़ मैदानों पर अतिक्रमण से बढ़ी आपदा की चिंता

हिमालयी क्षेत्र में तेजी से बदलते पर्यावरणीय हालात के बीच भारत में ग्लेशियल झीलों से जुड़े संभावित बाढ़ के खतरे ने चिंता बढ़ा दी है। हालिया रिपोर्ट के मुताबिक देश में 2,500 से ज्यादा ग्लेशियल झीलें संवेदनशील मानी जा रही हैं, जबकि देश के 36 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में से 27 आपदा के लिहाज से संवेदनशील क्षेत्र में आते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार ग्लेशियरों के पिघलने, झीलों के आकार में बढ़ोतरी और अचानक भारी बारिश जैसी घटनाएं भविष्य में गंभीर जोखिम पैदा कर सकती हैं।

ग्लेशियल झीलों से जुड़ी सबसे बड़ी चिंता ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) है। इसमें किसी ग्लेशियल झील का प्राकृतिक बांध अचानक टूटने या पानी का तेज बहाव बाहर निकलने से निचले क्षेत्रों में कुछ ही समय में भारी मात्रा में पानी पहुंच सकता है। इसके साथ मलबा और पत्थर भी नीचे की ओर बह सकते हैं, जिससे नदी घाटियों में बसे गांवों, सड़कों, पुलों, जलविद्युत परियोजनाओं और अन्य बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचने का खतरा रहता है।
केंद्रीय जल आयोग की निगरानी में भारत की कई हिमनदी झीलों को विशेष निगरानी की जरूरत वाली श्रेणी में रखा गया है। 2025 की एक निगरानी रिपोर्ट में 432 ग्लेशियल झीलों के जल क्षेत्र में विस्तार दर्ज किया गया था। इनमें लद्दाख, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश जैसे हिमालयी क्षेत्र शामिल हैं।

हाल में नेपाल-तिब्बत क्षेत्र में हुई विनाशकारी बाढ़ ने भी हिमालयी ग्लेशियरों और उनसे जुड़ी झीलों के खतरे को लेकर चिंता बढ़ाई है। विशेषज्ञों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण तापमान बढ़ने से ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं और कई ऊंचाई वाले क्षेत्रों में बर्फ, चट्टान और पर्वतीय ढलानों की स्थिरता प्रभावित हो रही है। इससे अचानक बाढ़ और भूस्खलन जैसी घटनाओं का जोखिम बढ़ सकता है।
हालांकि 2,500 से ज्यादा झीलों का संवेदनशील होना यह नहीं बताता कि सभी झीलें कभी भी फट सकती हैं। जोखिम हर झील की भौगोलिक स्थिति, पानी की मात्रा, प्राकृतिक बांध की मजबूती और आसपास की परिस्थितियों पर निर्भर करता है। इसलिए विशेषज्ञ लगातार निगरानी, शुरुआती चेतावनी प्रणाली और संवेदनशील इलाकों में बेहतर आपदा तैयारी पर जोर दे रहे हैं।