तीन बार प्रतिबंध के बावजूद मजबूत रहा संघ, बयान की व्यावहारिकता पर उठे सवाल

कांग्रेस नेता पवन खेड़ा के हालिया बयान ने राजनीतिक गलियारों में नई बहस छेड़ दी है। खेड़ा ने कहा कि कांग्रेस की सरकार आने पर “संघ नाम की संस्था खत्म हो जाएगी।” इस बयान को कांग्रेस के आक्रामक राजनीतिक रुख के तौर पर देखा जा रहा है, लेकिन इसके साथ ही इसकी व्यावहारिकता पर भी सवाल उठ रहे हैं।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी RSS भारतीय राजनीति और सामाजिक क्षेत्र में लंबे समय से सक्रिय संगठन है। इतिहास में संघ पर तीन प्रमुख मौकों—1948, 1975 और 1992—में प्रतिबंध लगाया गया। हालांकि, प्रतिबंध हटने के बाद संघ की संगठनात्मक गतिविधियां दोबारा जारी रहीं और उसका सामाजिक एवं वैचारिक नेटवर्क व्यापक होता गया।

राजनीतिक विश्लेषण के लिहाज से पवन खेड़ा के बयान को कांग्रेस की वैचारिक रणनीति से जोड़कर देखा जा सकता है। एक ओर यह संघ-विरोधी और धर्मनिरपेक्ष मतदाताओं को स्पष्ट राजनीतिक संदेश देने की कोशिश हो सकती है, वहीं दूसरी ओर पार्टी कार्यकर्ताओं और समर्थकों में वैचारिक ऊर्जा पैदा करने का प्रयास भी माना जा सकता है।

हालांकि, सत्ता में आने के बाद सरकार प्रशासनिक और कानूनी कदम उठा सकती है, लेकिन किसी व्यापक सामाजिक-वैचारिक संगठन को केवल राजनीतिक घोषणा के आधार पर समाप्त करना आसान नहीं होगा। ऐसे में पवन खेड़ा का बयान फिलहाल राजनीतिक संदेश और चुनावी रणनीति के रूप में अधिक महत्वपूर्ण दिखाई देता है।