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*भारत में नबियों के बाद मुसलमानों के सबसे आदरणीय श्रीकृष्ण : जन्माष्टमी मुबारक हो ! नजीर मलिक का लेख। The Indian Opinion*

इस्लाम में तकरीबन सवा लाख पैगम्बरों का जिक्र मिलता है। जिनमें 26 के नाम का जिक्र है। इसके अलावा अन्य के बारे में कुछ संकेत दिये गये है। उन नबियों का संकेत के आधार पर कभी पहचान नहीं हो सकने की हालत में यह भी सलाह जारी की गई है कि “इस्लाम वालो तुम दूसरे मजहब के नबियों की बुराई न करो, हो सकता है कि वह भी कोई नबी हो” ।

भारत में 629 इस्वी में इस्लाम आने के बाद जब दोनों संस्कृतियों का मेल हुआ तो कई बार राम, कृष्ण, शिव आदि की चर्चा भी हुई। इनमें से कुछ मुस्लिम विद्धानों ने हिंदू धर्म के उन महानायकों की शान में कसीदे भी लिखे। इनमें से श्री कृष्ण को जी पर तमाम सूफी संतों एंव मुस्लिम विद्धानों ने हजारों कसीदे लिखे। श्री कृष्ण जी की शान में मुसलमानों ने जितना लिखा, उतना दुनियां के अन्य किसी मजहब के महापुरुषके बारे में नहीं लिखा। मेरा मानना है कि शायद इसलिए कि इस्लाम में वर्णित नाम वाले नबियों के बाद श्री कृष्ण जी को ही अपने करीब पाते हैं। इसीलिए विद्धान सईद सुलतान ने अपनी किताब में “नबी बंगश” में इस्लामिक नबियों के अलावा केवल श्रीकृष्ण को नबी समान दर्जा दिया है।
यों तो भारत में इस्लाम बहुत पहले ६२९ में अरब व्यापारियों के साथ केरल के माध्यम से भारत में आया और पहलह मस्जिद भी वही बनी। मगर भारत में ग्यारहवीं शताब्दी के बाद इस्लाम तेज़ी से फैला। लगभग इसी समय भक्ति काल और सूफ़ीवाद में ज़बरदस्त संगम हुआ। भारत में इस्लाम कृष्ण के प्रभाव से अछूता नहीं रह पाया। सूफ़ीवाद ईश्वर और भक्त का रिश्ता प्रेमी और प्रेमिका के संबंध की मानिंद मानता है. इसलिए राधा या फिर गोपियां या सखाओं का कृष्ण से प्रेम सूफ़ीवाद की परिभाषा में एकदम सटीक बैठ गया।

नज़र ज़ाकिर अपने लेख ‘ब्रीफ़ हिस्ट्री ऑफ़ बांग्ला लिटरेचर’ में लिखते हैं कि चैतन्य महाप्रभु के कई मुस्लिम अनुयायी थे।
स्वतंत्रता सेनानी, गांधीवादी और उड़ीसा के गवर्नर रहे बिशंभर नाथ पांडे ने वेदांत और सूफ़ीवाद की तुलना करते हुए एक लेख में कुछ मुसलमान विद्धानों का ज़िक्र किया है, इनमें सबसे पहले थे सईद सुल्ता समान जिन्होंने अपनी क़िताब ‘नबी बंगश’ में कृष्ण को नबी का दर्ज़ा दिया।. दूसरे थे अली रज़ा। इन्होंने कृष्ण और राधा के प्रेम को विस्तार से लिखा। तीसरे, सूफ़ी कवि अकबर शाह जिन्होंने कृष्ण की तारीफ़ में काफी लिखा। बिशंभर नाथ पांडे बताते हैं कि बंगाल के पठान शासक सुल्तान नाज़िर शाह और सुल्तान हुसैन शाह ने महाभारत और भागवत पुराण का बांग्ला में अनुवाद करवाया. ये उस दौर के सबसे पहले अनुवाद का दर्ज़ा रखते हैं।
और उस दौर के सबसे मशहूर कवि अमीर ख़ुसरो की कृष्ण भक्ति की बात ही कुछ और है। बताते हैं एक बार निज़ामुद्दीन औलिया के सपने में श्रीकृष्ण आये। औलिया ने अमीर ख़ुसरो से कृष्ण की स्तुति में कुछ लिखने को कहा तो ख़ुसरो ने मशहूर रंग ‘छाप तिलक सब छीनी रे से मोसे नैना मिलायके’ कृष्ण को समर्पित कर दिया। इसमें कृष्ण का उल्लेख यहां मिलता है, “…ऐ री सखी मैं जो गई थी पनिया भरन को, छीन झपट मोरी मटकी पटकी मोसे नैना मिलाईके.”।

कृष्णकी शान में आलम शेख लिखते हैं कि “पालने खेलत नंद-ललन छलन बल” तो नजीर अकबरा अकबराबादी लिखते है कि ‘यह लीला है उस नंदललन की, मनमोहन जसुमत छैया की रख ध्यान सुनो, दंडौत करो, जय बोलो किशन कन्हैया की.’इतिहास में एक मुस्लिम कवियित्री भी मिलती है। ताज मुगलानी नामक इस विद्धान का लिखना है कि “नन्द जू का प्यारा, जिन कंस को पछारा, वह वृन्दावनवारा कृष्ण साहिब हमारा है़”। और तो और ताजा सदी में मौलाना हसरत मोहानी साहब ने भी लिख कर मान लिया कि “हर जर्रा सरजमीने- गोकुल वारा”। श्रीकृष्ण के प्रति मोहब्बत का यह आलम था कि मौलाना हसरत मोहानी जब कभी हज से वापस आते थे तो श्रीकृष्ण की पावन भूमि ‘वृंदावन’ ज़रूर जाया करते थे।

कितने नाम लिखें? “अगर कृष्ण की तालीम आम हो जाए” लिखने वाले अली सरदार जाफरी से लेकर रहीम, रसखान, नवाब वाजिद अली शाह, मुसाहिब लखनवी, सैयद इब्राहीम, उमर अली, रीतिकाल के कवि नसीर मसूद ने श्रीकृष्ण जी को lसदा अपने करीब पाया है। पदमश्री बेकल उत्साही साहब ने तो “ भाव स्वभाव के मोल में दो अक्षर अनमोल, नबी मेरा इतिहास है कृष्ण मेरी भूगोल” लिख कर एक इतिहास ही रच दिया है।ऐसा नहीं यह केवल केवल कवियों ने लिखा, यह मुस्लिम जनमानस में भी गूंजता है। आज भी हमारे देहात के मुस्लिम क्षेत्र में जहां सोहर गान प्रचलित है, वहां मुसिलम महिलाएं बच्चो के जन्म पर “ द्धारे पर खबर जनाओं कि नंदलाल भुइयां गिरे हैं” अथवा “उवा (उगा) किशनतारा मदीने में” गाते पायी जाती हैं।

आप सभी को कृष्ण जनम अष्टमी की मुबारकबाद

Nazeer Malik की वाल से

द इंडियन ओपिनियन