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लाल बहादुर शास्त्री की हत्या या संदिग्ध मौत! अपने प्रधानमंत्री को भी इंसाफ नहीं दे सके देश के नेता?

आखिर क्यों भारत जैसे बड़े देश के प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की विदेश में संदिग्ध मौत के बावजूद उनके शव का पोस्टमार्टम नहीं करवाया?

1965 की जंग में शास्त्री जी के नेतृत्व में भारत की सेना लाहौर तक घुस गई थी पाकिस्तान के हजारों वर्ग किलोमीटर पर भारतीय सेना का कब्जा हो गया था फिर भी ताशकंद समझौते में बिना POK के वापस लिए पाकिस्तान को जीता हुआ भूभाग लौटाने के लिए शास्त्री जी पर किसने दबाव बनाया?

युद्ध जीतने के बाद भी ताशकंद समझौते से भारत के हुए रणनीतिक नुकसान और शास्त्री जी की मौत में क्या है संबंध?

हर साल 2 अक्टूबर को महात्मा गांधी का जन्मदिन पूरे देश में मनाया जाता है देश के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का भी जन्मदिन मनाया जाता है लेकिन भारत की जनता को शायद अब याद भी नहीं रहा की देश में हरित क्रांति और श्वेत क्रांति की शुरुआत करने वाले जय जवान और जय किसान का नारा देने वाले देश के सबसे ईमानदार देशभक्त और बहादुर प्रधानमंत्री ने किन हालातों में विदेश में जान गवा दी थी।

दुनिया के तमाम ताकतवर देशों की नाराजगी की परवाह न करते हुए पाकिस्तान के हमले का शास्त्री जी के नेतृत्व में भारतीय फौज ने ऐसा जवाब दिया था की लाहौर शहर पर भी भारतीय फौज ने कब्जा कर लिया था पाकिस्तान को हराते हुए उनकी सीमा के सैकड़ों किलोमीटर अंदर तक भारतीय फौज घुस गई थी और यह सब हुआ था लाल बहादुर शास्त्री की हिम्मत और साहस के दम पर।

लेकिन 11 जनवरी 1966 को अमेरिका और रूस के दबाव में लाल बहादुर शास्त्री को पाकिस्तान से समझौते के लिए ताशकंद बुलवाया गया उस समय ताशकंद तत्कालीन सोवियत संघ का एक महत्वपूर्ण शहर था। भारत से बुरी तरह युद्ध हारने के बाद पाकिस्तान ने रूस और अमेरिका से गुहार लगाई संयुक्त राष्ट्र में छाती पीटकर भारत पर युद्ध विराम और समझौते का दबाव बनाया इतना ही नहीं ताशकंद समझौते में भारतीय सेना द्वारा जीते गए पाकिस्तानी भूभाग को वापस लौटाने की बात भी मनवा ली।

युद्ध की शुरुआत पाकिस्तान ने की थी और कश्मीर के लगभग 40 फ़ीसदी हिस्से पर 1948 से ही पाकिस्तान काबिज था और उसे वापस करने की बात ताशकंद समझौते में नहीं की गई कुल मिलाकर ताशकंद समझौते में भारत को सिर्फ नुकसान हुआ इसके बावजूद शास्त्री जी पर यह समझौता करने का दबाव बनाया गया । 10 जनवरी 1966 को पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान और भारत के प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के बीच ताशकंद समझौते के 12 घंटे बाद 11 जनवरी को संदिग्ध परिस्थितियों में लाल बहादुर शास्त्री ताशकंद के जिस गेस्ट हाउस में रुके थे वही उनकी मौत हो गई ।
उनके शरीर पर 2 कट पाए गए थे जिन से ब्लीडिंग हो रही थी शरीर के कई हिस्सों पर नीले और काले निशान थे। उनके परिवार के लोगों ने शास्त्री जी की हत्या का आरोप लगाया और सरकार से उच्च स्तरीय जांच की मांग भी की लेकिन भारत सरकार ने अपने ही प्रधानमंत्री की हत्या की जांच नहीं करवाई पोस्टमार्टम भी नहीं करवाया।

आखिर क्यों? क्या शास्त्री जी के बाद प्रधानमंत्री की कुर्सी पर कब्जा करने के लिए साजिश को अंजाम दिया गया या फिर विदेशी एजेंटों ने भारत के बाद प्रधानमंत्री को इसलिए मरवा दिया कि वह भारत को दुनिया की महाशक्ति बनाने के काम में जुट गए थे शास्त्री जी की मौत का रहस्य जानने वाले डॉक्टर चुग और उनके पूरे परिवार की एक संदिग्ध कार एक्सीडेंट में हत्या करवा दी गई , सरकार ने इसे सामान एक्सीडेंट मान कर पल्ला झाड़ लिया था।

शास्त्री जी की मौत का रहस्य जानने के लिए भारत के बहुत से लोगों ने आरटीआई से जवाब मांगे तो सरकार ने विदेशी संबंधों के बिगड़ने का हवाला देकर चुप्पी साध ली हैरानी की बात यह है कि शास्त्री जी की मौत के बाद उनकी अपनी पार्टी कांग्रेस लंबे समय तक शासन में रही लेकिन कांग्रेस के नेताओं और तमाम प्रधानमंत्रियों ने भी शास्त्र जी की मौत की जांच करवाने की जरूरत नहीं समझी।

बीजेपी सरकार ने विपक्ष में रहते हुए इस मुद्दे को उठाया लेकिन सत्ता में आने के बाद भाजपा भी शास्त्री जी की मौत के रहस्य पर पर्दा डाले रही। शास्त्री जी की मौत से जुड़े विषय पर फिल्म बनाई गई और पुस्तकें भी लिखी गई लेकिन निष्कर्ष तक कोई नहीं पहुंच पाया । उनके साथ ताशकंद दौरे में रहे उनके सलाहकार कुलदीप नैयर भी उनकी मौत को एक बड़ी साजिश होने से इंकार नहीं करते ।
कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि शास्त्री जी के भोजन में जहर दिया गया था क्योंकि शास्त्री धार्मिक प्रवृत्ति के थे और हमेशा शुद्ध शाकाहारी सात्विक भोजन करते थे किसी भी दौरे पर हमेशा उनके साथ उनके निजी सहायक रामनाथ ही उनका भोजन तैयार करते थे रामनाथ ही प्रधानमंत्री शास्त्री के ऑफिशियल कुक थे लेकिन ताशकंद में रामनाथ उस रात शास्त्री जी के किचन से हटा दिया गया था और उनका भोजन जान मोहम्मद नाम के एक दूसरे कुक ने पकाया था।

भोजन में जहर देने के संदेह के आरोप पर रूसी प्रशासन ने जान मोहम्मद को गिरफ्तार भी किया था लेकिन पोस्टमार्टम ना होने की वजह से मामले में मुकदमा दर्ज ही नहीं किया गया इसलिए कोई कार्रवाई नहीं हो सकी। बाद में शास्त्री जी के सहायक रामनाथ की संदिग्ध मौत होने से इस पूरे मामले में बड़ी साजिश का अंदेशा और मजबूत हो जाता है।

अब देश में नरेंद्र मोदी की सरकार है और खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दावा करते हैं कि उनके लिए देश का सम्मान सबसे ऊपर है तो उनके लिए भी यह बड़ा सवाल है कि वह क्यों नहीं जय जवान जय किसान का नारा देने वाले लाल बहादुर शास्त्री की मौत की जांच करवाने का ऐलान करते हैं।

शास्त्री जी भारत के ऐसे प्रधानमंत्री थे जिनकी कहने पर पूरे देश के लोगों ने सप्ताह में एक समय का भोजन छोड़ दिया था उस समय देश में खाद्यान्नों का संकट था और कृषि उपज कम थी शास्त्री जी के पहल पर देश में कृषि सुधार और कृषि आधुनिकरण लागू हुआ जिसे हरित क्रांति का नाम दिया गया इसके साथ ही दूध का उत्पादन बढ़ाने के लिए दुग्ध क्रांति की शुरुआत हुई शास्त्री जी को देश की सेवा करने के लिए प्रधानमंत्री के तौर पर बहुत कम समय मिला लेकिन उन्होंने आर्थिक उदारीकरण की शुरुआत का निर्णय ले लिया था यदि वह जीवित रहते तो निश्चित ही भारत वर्तमान विकास यात्रा में कम से कम तीन दशक आगे होता।

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