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नागरिकता कानून विरोध/समर्थन हिंसक क्रिया/प्रतिक्रिया, दिलों में फैलता जहर देश के लिए ठीक नहीं!

विकास चंद्र अग्रवाल-

लोगों के मन में उमड़ता आक्रोश … समय रहते अगर आवश्यक कदम  न उठाये गए तो स्थिति विस्फोटक हो सकती है

नागरिकता कानून का विरोध देश में हिंसक प्रदर्शनों के साथ शुरू हुआ दिल्ली लखनऊ समेत कई शहरों में सार्वजनिक संपत्ति जलाई गई  हिंसा में कई लोग भी मारे गए कई पुलिसकर्मी भी घायल हुए  जब पुलिस प्रशासन सख्त हुआ  तब लोगों ने प्रदर्शन की अगुवाई महिलाओं को सौंप दी  महिलाओं के आगे पुलिस  के लिए भी सख्ती करना मुश्किल है। नागरिकता कानून के विरोध में  देश में विरोध प्रदर्शन  महिलाओं की रैलियों का सिलसिला जारी है  वही समर्थन में भी बड़ी-बड़ी रैलियां और जनसभाएं हो रही है  कुछ स्थानों पर  नागरिकता कानून के समर्थन में होने वाली रैलियों पर हमले हुए पथराव व आगजनी हुई  झारखंड में नागरिकता कानून के समर्थन में प्रदर्शन करने वाले एक युवक की हत्या भी हो गई।

इसके अलावा पिछले तीन दिनों में दो घटनाएँ होती हैं। पहली घटना में एक 17 साल का युवक जामिया में रिवाल्वर से फायर करता है  जिससे एक छात्र घायल हो जाता है ।

यह युवक व्हाट्सएप के कुछ ग्रुपों पर सक्रिय है और मानने लगा है कि उसका धर्म खतरे में है । उसे नागरिकता कानून का विरोध करने वालों से चिढ़ है । उसे परिवार के साथ एक शादी में जाना है। घर वाले उसे  दस हज़ार रुपये देते हैं कपड़े सिलवाने के लिए और वह उन रुपयों से रिवॉल्वर खरीद कर इस घटना को अंजाम दे देता है ।

दूसरी घटना कल शाहीन बाग़ की है । डेरी का काम करने वाला एक युवक शाहीन बाग़ के धरने से परेशान है । उसकी रोज़ाना तय करने वाली दूरी इस धरने की वजह से 10 किलोमीटर से बढ़कर 35 किलोमीटर हो जाती है। वह रात को मध्यरात्रि के बाद घर पहुँच पाता है । इससे परेशान वह शाहीन बाग पर हिन्दू राष्ट्र का नारा लगाते हुए हवाई फायर कर देता है ।

दो अलग अलग घटनाएँ है जो दो अलग व्यक्तियों द्वारा अंजाम दी गईं पर कुछ तो समानता है दोनों घटनाओं में । दोनों ही जामिया और शाहीन बाग में हो रही गतिविधियों से  खुश नहीं थे परन्तु अपने विरोधाभास को क्या हम इस तरह व्यक्त करेंगे ?

कहीं राजनैतिक दल सत्ता पर काबिज रहने या फिर सत्ता में वापसी की होड़ में समाज में इतना ज़हर तो नहीं घोले जा रहे हैं  जिसको सम्हालना किसी के भी बस की बात न  रहे ।

वैचारिक मतभेद लोकतंत्र के लिये संजीवनी की तरह है। इसके बिना कोई भो लोकतंत्र  पनप नहीं सकता । हर किसी को हक़ है वह दूसरे से अलग अपनी राय  रखे और व्यक्त करे  परन्तु ऐसा शालीनता के साथ होना चाहिये।

इन दोनों घटनाओं का पूरी गंभीरता से संज्ञान लेते हुए धीरे धीरे विशाक्त होते माहौल को सामान्य करने के लिए तत्काल प्रभावी कदम उठाने की नितान्त आवश्यकता है।

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