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US Operation Economic Outcast: ईरान पर अमेरिका की नई आर्थिक घेराबंदी, क्या भारत भी आएगा इसकी जद में?

चार भारतीय कंपनियों पर कार्रवाई के बाद बढ़ी चिंता, तेल और कारोबार पर पड़ सकता है असर

नई दिल्ली। अमेरिका ने ईरान की अर्थव्यवस्था को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग करने के लिए ‘Operation Economic Outcast’ नाम से बड़ा आर्थिक अभियान शुरू किया है। अमेरिकी ट्रेजरी के मुताबिक इस अभियान का उद्देश्य ईरान की तेल बिक्री, वित्तीय नेटवर्क, शिपिंग और दूसरे आर्थिक स्रोतों पर दबाव बढ़ाना है। अमेरिका ने ईरान से जुड़े करीब 60 व्यक्तियों, कंपनियों और जहाजों पर नए प्रतिबंध लगाए हैं। साथ ही ईरान के साथ कारोबार करने वाले दूसरे देशों और कंपनियों पर भी भविष्य में कार्रवाई की चेतावनी दी गई है।

इस अभियान में भारत का नाम भी सामने आया है। अमेरिका ने ईरान के पेट्रोलियम और पेट्रोकेमिकल कारोबार से कथित संबंधों को लेकर चार भारत-आधारित कंपनियों पर प्रतिबंध लगाया है। इनमें Portease Partners, Sadashiva Overseas Ltd, PP Softtech और Prakrutees Infra शामिल हैं। अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक इन कंपनियों ने ईरानी पेट्रोलियम या पेट्रोकेमिकल उत्पादों से जुड़े कारोबार में भूमिका निभाई थी। तीन भारतीय नागरिकों को भी प्रतिबंधों के दायरे में रखा गया है।

हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि अमेरिका ने पूरे भारत पर प्रतिबंध लगा दिया है। चिंता मुख्य रूप से उन भारतीय कंपनियों और कारोबारों को लेकर है जिनका ईरान से सीधा या अप्रत्यक्ष व्यापारिक संबंध है। अमेरिका secondary sanctions के जरिए ऐसे विदेशी कारोबारों पर दबाव डाल सकता है, जो प्रतिबंधित ईरानी संस्थाओं के साथ कारोबार जारी रखते हैं।

भारत के लिए सबसे बड़ा सवाल तेल, निर्यात और भुगतान व्यवस्था को लेकर है। भारत का ईरान के साथ व्यापार पिछले कुछ वर्षों में काफी कम हुआ है, लेकिन चावल, चाय और फार्मास्युटिकल उत्पादों का निर्यात अभी भी महत्वपूर्ण है। नए अमेरिकी प्रतिबंधों और दुबई के जरिए होने वाले कुछ व्यापारिक एवं वित्तीय रास्तों में आई रुकावट से भारतीय निर्यातकों की लागत बढ़ने और भुगतान में दिक्कत आने की आशंका है।

इसके अलावा चाबहार पोर्ट भारत के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। अमेरिकी प्रतिबंधों का दायरा बढ़ने से चाबहार और भारत-ईरान व्यापारिक परियोजनाओं को लेकर भी नई चुनौतियां पैदा हो सकती हैं। फिलहाल भारत के लिए चुनौती यह है कि वह ईरान के साथ अपने रणनीतिक और व्यापारिक हितों को बनाए रखते हुए अमेरिकी प्रतिबंधों से पैदा होने वाले जोखिम को कैसे संभालता है।

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