निर्वासन से वापसी तक विवाद और राजनीति गरमाई

कोलकाता: बांग्लादेश की चर्चित लेखिका तसलीमा नसरीन एक बार फिर सुर्खियों में हैं। करीब 19 साल पहले कोलकाता छोड़ने को मजबूर हुईं तसलीमा की संभावित वापसी को लेकर पश्चिम बंगाल की राजनीति में नई बहस छिड़ गई है। राजनीतिक दलों के बीच इस मुद्दे पर बयानबाजी तेज हो गई है।
तसलीमा नसरीन को वर्ष 1994 में अपने विवादित उपन्यास लज्जा के प्रकाशन के बाद बांग्लादेश छोड़ना पड़ा था। कट्टरपंथी संगठनों के विरोध और जान से मारने की धमकियों के चलते उन्हें देश से निर्वासन का सामना करना पड़ा। इसके बाद उन्होंने यूरोप सहित कई देशों में शरण ली और लंबे समय तक भारत में भी रहीं।

वर्ष 2004 में तसलीमा को भारत में रहने की अनुमति मिली और उन्होंने कोलकाता को अपना ठिकाना बनाया। हालांकि, नवंबर 2007 में उनके खिलाफ बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए। शहर में कानून-व्यवस्था की स्थिति बिगड़ने के बाद प्रशासन ने सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए उन्हें कोलकाता छोड़ने के लिए कहा। इसके बाद उन्हें दिल्ली स्थानांतरित किया गया, जहां कुछ समय तक सुरक्षित स्थान पर रखा गया।
अब लगभग 19 साल बाद उनकी संभावित कोलकाता वापसी की खबरों ने पश्चिम बंगाल की राजनीति में नया विवाद खड़ा कर दिया है। एक पक्ष इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मुद्दा बता रहा है, जबकि दूसरा पक्ष कानून-व्यवस्था और सामाजिक संवेदनशीलता का हवाला दे रहा है।

तसलीमा नसरीन लंबे समय से महिलाओं के अधिकार, धर्मनिरपेक्षता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे मुद्दों पर मुखर रही हैं। यही वजह है कि उनका नाम समय-समय पर सामाजिक और राजनीतिक बहस का केंद्र बनता रहा है। अब सभी की नजर इस बात पर है कि उनकी संभावित वापसी को लेकर सरकार और प्रशासन क्या निर्णय लेते हैं।